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Sunday, 6 February 2011

क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए?

 देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? 

 देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं।
एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है

एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।            इसी खानदान का लग उठेगा उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुऔर लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।"
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।
>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भीहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।
>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास- रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?" जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे। - अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे) - जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया।   वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए। - एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका। - बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी। - नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं। - आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

Friday, 4 February 2011

मोहम्मद अफजल कि फांसी टाल सकती हैं, रोक नहीं सकती यूपीए सरकार

मोहम्मद अफजल कि फांसी टाल सकती हैं, रोक नहीं सकती यूपीए सरकार

 

यों तो राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ठीक नहीं किया। आतंकी के परिवार को मिलना मुनासिब नहीं था। कलाम अगर मोहम्मद अफजल की रहम की अपील पाटिल को न भेजते। तो कोई गुनाह नहीं करते। अलबत्ता आतंकवाद के खिलाफ कड़े रुख का संदेश देते। यों भी मोहम्मद अफजल को न अफसोस। न उसने रहम की अपील की। सो राष्ट्रपति उसे रद्दी की टोकरी में फेंक सकते थे। जरुर कलाम ने गृह मंत्री की सिफारिश पर किया होगा। शिवराज पाटिल से ऐसी सिफारिश की उम्मीद किसको नहीं होगी। राष्ट्रपति ने एक आतंकी को फांसी की सजा से रोककर अच्छा नहीं किया। सोनिया-मनमोहन की सरकार  सिफारिश करने से रही। आतंकवाद समर्थक मुस्लिम नेताओं का मकसद पूरा हुआ। अब  अफजल को फांसी नहीं होगी। राष्ट्रपति उनके मकसद पूरा होने में ढ़ाल बने। जाते-जाते उन ने खुद पर सांप्रदायिकता का लेबल चिपका लिया। पंजाब में जब आतंकवाद शिखर पर था। तो आतंकी हरजिंदर सिंह जिंदा ने पूर्व सेनाध्यक्ष ए.एस. वैद्य को बम से उड़ा दिया था। हरजिंदर सिंह जिंदा को सजा-ए-मौत हुई। रहम की अपील राष्ट्रपति को पहुंची। राष्ट्रपति तब ज्ञानी जैल सिंह थे। तेरह घंटे में रहम की अपील खारिज हो गई। जैल सिंह ने सिखवाद नहीं चलाया। जब मोनिका बेदी ने मनमोहन सिंह से रहम की अपील की। तो मनमोहन सिंह ने भी सिखवाद नहीं चलाया। पर जाने-अनजाने राष्ट्रपति से यह गलती हो गई। वह कुछ तो गुलाम नबी आजाद के चक्कर में आ गए। कुछ अपने शिवराज पाटिल और यूपीए सरकार के चक्कर में। यूपीए सरकार ने आतंकवाद को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लिया होता,तो पोटा रद्द न करते। अफजल की साजिश सिरे चढ़ गई होती। आतंकी सुरक्षा घेरा तोड़कर संसद भवन में घुस गए होते। तो अब अफजल की माफी के ज्यादातार पैरवीकार सिधार चुके होते। यों अपन को पहले से पता था। यूपीए सरकार मोहम्मद अफजल को माफी की सिफारिश कर भी दे। तो भी मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। इंदिरा गांधी के हत्यारे केहर सिंह के मामले में पहले से यह फैसला था। कोर्ट कह चुकी थी- 'राष्ट्रपति-राज्यपालों के सजा माफी के हक की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।' अपन को यह नहीं पता था। ऐसा ही एक मामला में सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। जिसका फैसला  हुआ। तो अफजल के पैरवीकारों की टांगें कंपकपाने लगी। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र के गवर्नर के सजा माफी के फैसले पर फैसला दिया। हत्या हुई थी तेलुगुदेशम के वर्कर की। हत्यारा था कांग्रेस का वर्कर। सजा हुई दस साल की। तब तेलुगुदेशम की सरकार थी। अपने चंद्रबाबू सीएम थे। चुनाव हुआ। सरकार बदल गई। तेलुगुदेशम की जगह पर कांग्रेसी सरकार बन गई। चंद्रबाबू की जगह पर वाईएस राजशेखर रेड्डी सीएम बन गए। सुरजीत सिंह बरनाला की जगह सुशील कुमार शिंदे गवर्नर हो गए। हत्यारा कांग्रेसी, सीएम कांग्रेसी, गवर्नर कांग्रेसी। बस हो गया फैसला। धरी रह गई न्याय प्रणाली। अपराधियों का राजनीतिक गठजोड़ सामने आ गया। हत्यारे कांग्रेसी की पत्नी ने मौका ताड़ा। जो मौजूदा एमएलए भी थी। जब राजशेखर ने मंत्री नहीं बनाया। तो कम से कम पति की सजा माफी तो कराए। अर्जी लगा दी गई। कांग्रेसी-कांग्रेसी भाई-भाई हो गए। और सजा माफ हो गई। सुप्रीम कोर्ट  तगड़ी लताड़ लगाई। कहा- 'सांप्रदायिक, जातीय, राजनीतिक आधार पर सजा माफ नहीं हो सकती।' समझदार को इशारा काफी। कोर्ट ने राजनीतिक आधार पर हुई माफी रद्द की। पर लगते हाथों सांप्रदायिक और जातीय आधार भी गिना दिए। ताकि मनमोहन सरकार को भी सनद रहे। राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम को भी। अब आंतकियों और उनके समर्थकों का गठजोड़ फांसी टाल तो सकता है। रद्द नहीं करा सकता। पर लिखकर रख लीजिए। गुलाम नबी की चली। तो जब तक यूपीए सरकार रहेगी। फैसला नहीं होगा।

अब कांग्रेस का हाथ अफजल के साथ

गुलाम नबी आजाद का बयान आपने देखा। सिर्फ बयान पर बात रहती। तो इतना बवाल न होता। गुलाम नबी ने अफजल की फांसी माफ करने की चिट्ठी भी लिखी। चिट्ठी में लिखा-'जम्मू कश्मीर में कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी। पाकिस्तान के साथ संबंध भी बिगडेंग़े।' संसद पर हमला हुआ। यानी लोकतंत्र पर हमला हुआ। संसद पर हमला यानी देश पर हमला। अगर अफजल के खुद के बयान पर भरोसा करें। तो आतंकियों का इरादा सेंट्रल हॉल तक जाने का था। प्रधानमंत्री की हत्या करने का था। रास्ते में जो भी आता। उसे खत्म करने के इरादे से आए थे आतंकी। पर अपने वॉच एंड वार्ड ने आतंकियों के मंसूबे नाकाम किए। जान पर खेलकर मंसूबे नाकाम किए। दस सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान दे दी। पर आतंकियों को अंदर घुसने नहीं दिया। अपने राजस्थान के जगदीश प्रसाद यादव भी थे। अब अपन अगर अफजल को फांसी की सजा माफ कर दें। तो जगदीश प्रसाद यादव को अच्छी श्रद्धांजलि होगी। अपन अपने शहीदों को कैसी श्रद्धांजलि देना चाहते हैं। यह अपने कर्णधारों को तय करना होगा। गुलाम नबी उस समय सांसद थे। अगर आतंकी कामयाब होते। बीच में जगदीश यादव न आते। तो गुलाम नबी भी नहीं बचते। अपन उस समय संसद भवन के अंदर थे। अपन ने गोलियों की आवाज सुनी। तो दौड़ कर बाहर निकले। कोहराम मचा था। आतंकियों को अपन ने सामने से देखा। सुरक्षाकर्मी आतंकियों की गोलियों के बीच दरवाजे बंद करवा रहे थे। अपन बाहर तो निकल आए। पर अंदर घुसना मुश्किल हो गया। संसद भवन की दीवारों के साथ दौड़ते रहे। शायद कोई दरवाजा खुला मिले। एक दरवाजा बंद ही होने वाला था। अलबता हो ही गया था। बाहर खड़े सुरक्षाकर्मी ने अपन को दौड़ते देखा। तो दरवाजा अंदर से बंद करने वाले सुरक्षाकर्मी को गुहार लगाई। दरवाजा फिर खुला और अपन अंदर घुसे। अंदर न घुस पाते। तो आज आप यह कॉलम न भी पढ़ पाते। बाहर तो जितने रह गए थे। उनमें ज्यादातर शहीद हुए। और अब गुलाम नबी कहते हैं-'हत्यारों को माफ कर दो।' वजह बताते हैं-'कश्मीर में अमन बिगड़ जाएगा। पाक से रिश्ते खराब होंगे।' कांग्रेस ने पलट कर गुलाम नबी को नहीं कहा-'कानून व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो इस्तीफा दो।' कांग्रेस ने नहीं कहा-'विदेशों से रिश्ते तय करना सीएम का काम नहीं।' कांग्रेस ने विरोध नहीं किया। प्रवक्ता सोनिया गांधी की तरफ से बोले-'कांग्रेस न गुलाम नबी के स्टैंड का समर्थन करती है न विरोध।' कांग्रेस की चुप्पी गुलाम नबी को मौन समर्थन थी। पर जम्मू कश्मीर के हिंदू कांग्रेसियों की जमीन खिसक गई। दो दिन तो मंगतराम शर्मा हाईकमान के रूख का इंतजार करते रहे। पर हाईकमान ने गुलाम नबी को घुड़की नहीं पिलाई। तो खुद खुलकर सामने आए। उनने गुलाम नबी आजाद के स्टैंड का विरोध किया। कहा-'आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। संसद पर हमला, देश पर हमला था।' कांग्रेस ने फिर वही रूख अपनाया। तो कांग्रेस का दोहरा चेहरा सामने आया। हिंदुओं को खुश करने के लिए मंगतराम। मुसलमानों को खुश करने के लिए गुलाम नबी। चित भी मेरी पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का। हिंदुस्तान के सब मुस्लिम नेताओं का चेहरा बेनकाब होने लगा। सिर्फ गुलाम नबी आजाद क्यों। नए नए कांग्रेसी रशीद अल्वी का बयान देखिए। जनमत टीवी पर बहस में हिस्सा ले रहे थे। बोले-'जिसे आप आतंकवादी कहते हैं। उसे जम्मू कश्मीर में स्वतंत्रता सेनानी कह रहे हैं।' आपको परवेज मुशर्रफ और रशीद अल्वी में कोई फर्क दिखा। यही बात मुशर्रफ ने आगरा में कही थी। तो वाजपेयी ने बातचीत तोड़ दी थी। मुशर्रफ को बैरंग लौटा दिया था। तब तब बातचीत नहीं की। जब तक मुशर्रफ ने यह नहीं कहा-'पाक और पीओके से आतंकवादियों को भारत के खिलाफ षडयंत्र नहीं रचने देंगे। टे्रनिंग कैंप नहीं चलने देंगे।' भारत में एक क्लास पैदा हो चुकी। जो कश्मीर में आतंकियों को स्वतंत्रता सेनानी कहना शुरू हो चुकी। आप गुलाम नबी का बयान देख लें। रशीद अल्वी का बयान देख लें। इन दोनों कांग्रेसियों के अलावा पूर्व कांग्रेसी मुफ्ती मोहम्मद सईद का बयान देख लें। फारूख अबदुल्ला या उमर अबदुल्ला का बयान देख लें। हुर्रियत कांफ्रेंस तो सड़कों पर उतर ही चुकी। पीडीपी-नेंका में होड़ लग चुकी। पीडीपी चाहती हैं-'सेल्फ रूल।' नेंका चाहती हैं-'1953 से पहले की स्थिति।' कांग्रेस दोनों में संतुलन बना रही हैं। इसका असर दिखने लगा। गुलाम नबी ने अफजल की पत्नी को दिल्ली भेजा। राष्ट्रपति तक गुहार पहुंचाई। कुछ घंटों में याचिका राष्ट्रपति भवन से कूच कर गई। गृह मंत्रालय तक भिजवाने का बंदोबस्त हुआ। गृह मंत्रालय से भी घंटे भर में सूचना दिल्ली सरकार को पहुंच गई। तिहाड़ जेल भी पहुंच गई। इसे कहते है-'कांग्रेस का हाथ अफजल के साथ।' ऐसा न होता। तो ऐसी तेजी भी न होती।