Tuesday, 18 October 2016

Bharat mata ke swroop me maa durge Ji ki jhaki

Saturday, 21 February 2015

कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री ?

छठी इंद्री को अंग्रेजी में सिक्स्थ सेंस कहते हैं। सिक्स्थ सेंस को जाग्रत करने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान का विषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला है। गहरे ध्यान प्रयोग से यह स्वत: ही जाग्रत हो जाती है। मेस्मेरिज्म या हिप्नोटिज्म जैसी अनेक विद्याएँ इस छठी इंद्री के जाग्रत होने का ही कमाल होता है।
क्या है छठी इंद्री : मस्तिष्क के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से सुषुन्मा रीढ़ से होती हुई मूलाधार तक गई है। सुषुन्मा नाड़ी जुड़ी है सहस्रकार से।
इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर स्थित रहता है। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब हमारी नाक के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है। इस सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस जाग्रत होता है।
इड़ा, पिंगला और सुषुन्मा के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियाँ होती हैं। उक्त सभी नाड़ियों का शुद्धि और सशक्तिकरण सिर्फ प्राणायाम और आसनों से ही होता है। शुद्धि और सशक्तिकरण के बाद ही उक्त नाड़ियों की शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है।
कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री : यह इंद्री सभी में सुप्तावस्था में होती है। भृकुटी के मध्य निरंतर और नियमित ध्यान करते रहने से आज्ञाचक्र जाग्रत होने लगता है जो हमारे सिक्स्थ सेंस को बढ़ाता है। योग में त्राटक और ध्यान की कई विधियाँ बताई गई हैं। उनमें से किसी भी एक को चुनकर आप इसका अभ्यास कर सकते हैं।
अभ्यास का स्थान : अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहाँ फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके अन्यथा आगे नहीं बढ़ा जा सकता। शहर का वातावरण कुछ भी लाभदायक नहीं है, क्योंकि उसमें शोर, धूल, धुएँ के अलावा जहरीले पदार्थ और कार्बन डॉक्साइट निरंतर आपके शरीर और मन का क्षरण करती रहती है। स्वच्छ वातावरण में सभी तरह के प्राणायाम को नियमित करना आवश्यक है।
मौन ध्यान : भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अँधेरे को देखते रहें और यह भी जानते रहें कि श्वास अंदर और बाहर ‍हो रही है। मौन ध्यान और साधना मन और शरीर को मजबूत तो करती ही है, मध्य स्थित जो अँधेरा है वही काले से नीला और ‍नीले से सफेद में बदलता जाता है। सभी के साथ अलग-अलग परिस्थितियाँ निर्मित हो सकती हैं।
मौन से मन की क्षमता का विकास होता जाता है जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है। इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झाँकने की क्षमता भी बढ़ती है। यही सिक्स्थ सेंस के विकास की शुरुआत है।
अंतत: हमारे पीछे कोई चल रहा है या दरवाजे पर कोई खड़ा है, इस बात का हमें आभास होता है। यही आभास होने की क्षमता हमारी छठी इंद्री के होने की सूचना है। जब यह आभास होने की क्षमता बढ़ती है तो पूर्वाभास में बदल जाती है। मन की स्थिरता और उसकी शक्ति ही छठी इंद्री के विकास में सहायक सिद्ध होती है।
इसका लाभ : व्यक्ति में भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता है। अतीत में जाकर घटना की सच्चाई का पता लगाया जा सकता है। मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं। किसके मन में क्या विचार चल रहा है इसका शब्दश: पता लग जाता है। एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जा सकती है। छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंत हैं।

100 वर्ष जिंदा रहने के 5 उपाय

अच्छा भोजन :-
अच्छा भोजन चयन करना जरूरी है। ज्यादा मिर्च और तेल का भोजन नहीं करना चाहिए। बेसन और मैदे से बने आइटम तो त्याग ही देना चाहिए। किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए। सम्यक आहार लेला चाहिए अर्थात न ज्यादा और न कम।
भोजन करते वक्त जितनी भूख है उससे दो रोटी कम खाएं। भोजन में सलाद का ज्यादा प्रयोग करें। भोजन बैठकर (पालथी मारकर) ही करें। भोजन करते वक्त मन प्रसन्नचित्त रखें। ऐसा भोजन न करें, जिससे दांतों और आंतों को अतिरिक्त श्रम करना पड़े। भोजन करने के एक घंटे बाद ही पानी पीएं। यह भी ध्यान रखें क‍ि थाली में हाथ न धोएं। रात्रि का भोजन बहुत कम ही करें।
कहते हैं कि खान-पान में मात्रा जानने वाले, संभोग में नियम पालने वाले और अन्य बातों और इंद्रियों में संयम और सम्यकता समझने वाले को जब आंधी आती है तो सिर्फ छूकर चली जाती है, इससे विपरीत उक्त बातों का पालन न करने वाले को जड़ सहित उखाड़कर फेंक देती है।
जल-वायु :-
धरती की जलवायु अच्छी होगी तो धरती पर सेहतमंद होगी उसी तरह हमारे शरीर के भीतर की जल वायु का शुद्ध और तरोताजा होना जरूरी है। प्रदूषित जल और वायु से जहां भोजन खराब होता है वहीं इससे गंभीर रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।
जल :-
पानी (जल) पीएं छानकर। ध्यान रहे पानी हलका और मीठा पीएं। जब प्यास लगे तब पानी पीएं। पानी बैठकर ही पीएं। पानी गिलास से पीएं या फिर हाथों की अंजुली बनाकर ही पीएं। ऊपर से मुंह में पानी डालकर पीने के अपने नुकसान हैं। जिस पात्र में पानी भरा जाता है व पात्र ईशान कोण में रखा हो, उसके आसपास की जगह साफ हो।
वायु :-
भोजन कुछ दिन न मिले तो जीवन चल जाएगा। पानी कुछ घंटे न मिले तो भी चल जाएगा, लेकिन हवा हमें हर पल चाहिए। जिस तरह दूषित भोजन और पानी स्वत: ही निकल जाते हैं या कभी-कभार निकालने का प्रयास करते हैं, उसी तरह शरीर के फेफड़ों और पेट में एकत्रित दूषित वायु को निकालने का प्रयास ‍करें। हलके प्रेशर से सांस बाहर फेंक दें, फिर पूरी गहराई से सांस भीतर खींचें, भ्रस्त्रिका और कपालभाति के इस हिस्से को जब भी समय मिले करते रहें। छींक आए तो पूरी ताकत से छींकें।
शहरी प्रदूषण के कारण शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।
नींद :-
नींद एक डॉक्टर है और दवा भी। आपकी नींद कैसी होगी, यह निर्भर करता है इस पर क‍ि आप दिनभर किस तरह से जीएं। जरूरी है कार्य, विचार, आहार और व्यवहार पर गंभीर मंथन करना। यदि यह संतुलित और सम्यक रहेगा तो भरपूर ‍नींद से स्वास्थ्‍य में लाभ मिलेगा। यह भी ध्यान रखें क‍ि ज्यादा या कम नींद से सेहत और मन पर विपरीत असर पड़ता है। अच्छे स्वप्नों के लिए अच्छी दिनचर्या को मैनेज करें। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
झपकी ध्यान :-
यदि अत्यधिक कार्य के कारण आपकी नींद पूरी नहीं हो रही है तो सिर्फ एक मिनट का झपकी ध्यान करें। ऑफिस या घर में जब भी लगे तो 60 सेकंड की झपकी मार ही लें। इसमें साँसों के आवागमन को तल्लीनता से महसूस करें। गहरी-गहरी सांस लें। यह न सोचें क‍ि कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा। हां आफिस में इसे सतर्कता से करें, वरना बॉस गलत समझ बैठेंगे। इस ध्यान से आप स्वयं को हर वक्त तरोताजा महसूस करेंगे।
मन और मस्तिष्क :-
मानसिक द्वंद्व, चिंता, दुख: या दिमागी बहस हमारी श्वासों की गति को अनियंत्रित करते हैं, जिससे खून की गति भी असंतुलित हो जाती है। इसका सीधा असर हृदय, फेफड़े और पेट पर होता है और यह गंभीर रोग का कारण भी बन सकता है। मानसिक द्वंद्व या दुख हामारी उम्र घटाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सुख-दुख से परे मन और मस्तिष्क को शांत और प्रसन्न चित्त रखने के लिए आप सुबह और शाम को 10 मिनट का ध्यान करें। ध्यान करना जरूरी है। ध्‍यान से मस्तिष्क और मन को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है और इसके नियमित अभ्यास से किसी भी प्रकार की समस्या और दुख से व्यक्ति मुक्त हो जाता है।
मौन :-
मौन से मन की आंतरिक्त शक्ति और रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कुछ क्षण ऐसे होते हैं जबकि हम खुद-ब-खुद मौन हो जाते हैं। ऐसा कुछ विशेष परिस्थिति में होता है, लेकिन मौन रहने का प्रयास करना और यह सोचते हुए क‍ि मौन में कम से कम सोचने का प्रयास करूंगा, ज्यादा से ज्यादा देखने और श्‍वासों के आवागमन को महसूस करने का प्रयास करूंगा, एक बेहतर शुरुआत होगी। दो घंटे की व्यर्थ की बहस से 10 मिनट का मौन रिफ्रेश कर विजन पावर बढ़ाएंगा।
नियमित व्यायाम :-
वैज्ञानिकों का कहना है कि 70 साल का कोई व्यक्ति यदि नियमित व्यायाम करता है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वह 100 वर्ष की उम्र तक जिए।
आर्काइव्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित शोध के परिणाम कहते हैं कि लंबी उम्र के लिए हमारे जीन सिर्फ 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार होते हैं बाकी का काम तो जीवन शैली करती है।
इसलिए आप योगासन या हल्की-फुल्की कसरत करें और इस बता को अच्छी तरह से तय कर लें कि किसी भी कीमत में पेट और कमर की चर्बी न बढ़ने पाएं।

उम्र को बढ़ने से रोके 'तिब्ब‍ती योगा

उम्र को बढ़ने से रोके 'तिब्ब‍ती योगा'
आज की पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक जल्दी बूढ़ी हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार है बाहर का वातावरण, उसकी अनियमित जीवन पद्धति और खानपान। आज की जीवनशैली और बढ़ते काम का दबाव भी इसके लिए जिम्मेदार है। इस तेजी से जीने की जीवनशैली को बदलकर अनुशासनबद्ध जीवनशैली में जीने का नाम ही है 'तिब्ब‍ती योगा।
उम्र को रोकने का एक कारगर उपाय है 'तिब्बती योगा'। इसमें कुछ खास बात है जो आपको जवान बनाए रखने में सक्षम है बशर्ते की आप इसका ईमानदारी से पालन करते हैं। 'तिब्ब‍ती योगा में अनुशासन का बहुत महत्व है। ‍यहां प्रस्तुत है तिब्बती योगा की मुख्य मुख्‍य बातें।
1.श्वास पर नियंत्रण
2.नियमित ध्यान
3.अनुशासनबद्ध जीवन
4.उचित आहार
5.फलों का ज्यूस
6.शुद्ध वातावरण
8.पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए योगासन।
9.इसके अलावा कुछ खास तरीके से किए जाने वाले अंग संचालन।
आपकी आयु आपके शरीर की उपचय और अपचय की क्रियाओं पर निर्भर है। यानी यदि आपके शरीर में अपचय की तुलना में उपचय की क्रियाएं बढ़ रही होती हैं तो इसका मतलब आप बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। तिब्बती लामा योगाभ्यास इस हेतु ही करते हैं कि अंतःस्त्रावी ग्रंथियों के क्रम और चक्रों को उचित व्यवस्था में स्थित किया जा सके।
शरीर की चयापचयी क्रियाओं में संतुलन स्थापित कर शरीर के चक्र को सुधारकर शरीर को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सकता है।

उत्तर दिशा मेँ सिर रखकर क्योँ नहीँ सोना चाहिए

(1)हमारे पूर्वजों ने नित्य की
क्रियाओं के लिए समय, दिशा और आसन
आदि का बड़ी सावधानी पूर्वक वर्णन
किया है। उसी के अनुसार मनुष्य को
कभी भी उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर
नहीं सोना चाहिए।इसके कारण है कि
पृथ्वी का उत्तरी धुव्र चुम्बकत्व
का प्रभाव रखता है जबकि दक्षिण
ध्रुव पर यह प्रभाव नहीं पाया
जाता।
शोध से पता चला है कि साधारण चुंबक
शरीर से बांधने पर वह हमारे शरीर के
ऊत्तकों पर विपरीत प्रभाव डालता है
। इसी सिद्धांत पर यह निष्कर्ष भी
निकाला गया कि अगर साधारण चुंबक
हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव डाल
सकता है तो उत्तरी पोल पर प्राकृतिक
चुम्बक भी हमारे मन, मस्तिष्क व
संपूर्ण शरीर पर विपरीत असर डालता
है।
यही वजह है कि उत्तर दिशा की ओर सिर
रखकर सोना निषेध माना गया है।
(2)सर किस दिशा में करके सोना चाहिए
यह भी एक मुख कारण है….
उत्तरी ध्रुव की तरफ .. घनात्मक–. सर
करके न सोयें
वैसे तो जिधर चाहे मनुष्य सिर करके
सो जाता है, परंतु सिर्फ इतनी सी बात
याद रखा जाए कि उत्तर की ओर सिर करके
ना सोया जाये। इससे स्वप्न कम आते
हैं, निद्रा अच्छी आती है।
कारण- पृथ्वी के दो ध्रुवों उत्तर,
दक्षिण के कारण बिजली की जो तरंगे
होती है यानि, उत्तरी ध्रुव में ( )
बिजली अधिक होती है। दक्षिणी ध्रुव
में ऋणात्मक (-) अधिक होती है। इसी
प्रकार मनुष्य के सिर में विद्युत
का धनात्मक केंद्र होता है । पैरों
की ओर ऋणात्मक। यदि बिजली एक ही
प्रकार की दोनों ओर से लाई जाए तो
मिलती नहीं बल्कि हटना चाहती है।
यानि ( = -)
यदि घनत्व परस्पर विरुद्ध हो तो
दौडकर मिलना चाहती है जैसे यदि सिर
दक्षिण की ओर हो तो सिर का धनात्मक (
) और यदि पैर उत्तर ध्रुवतो, ऋणात्मक
(-) बिजली एक दूसरे के सामने आ जाती
है। और दोनों आपस में मिलना चाहती
है। परंतु यदि पांव दक्षिण की ओर हो
तो सिर का धनात्मक तथा उत्तरी ध्रुव
की धनात्मक बिजली आमने-सामने हो
जाती है और एक दूसरे को हटाती है
जिससे मस्तिष्क में आंदोलन होता
रहता है।एक दूसरे के साथ खींचा तानी
चलती रहती हैपूर्व औरपश्चिम में
चारपाई का मुख होने से कोई विषेश
फर्क नहीं होता, बल्कि सूर्य की
प्राणशक्ति मानव शरीर पर अच्छा
प्रभावडालतीहै
पुराने लोग इस नियम को भली प्रकार
समझते थे और दक्षिण की ओर पांव करके
किसी को सोने नहीं देते थे। दक्षिण
की ओर पांव केवल मृत व्यक्ति के ही
किये जाते हैं मरते समय उत्तर की ओर
सिर करके उतारने की रीति इसी नियम
पर है, भूमि बिजली को शीघ्र खींच
लेती है और प्राण सुगमता से निकल
जाते है।

भगवान को पाने के तीन सूत्र-रामकृष्ण परमहंस

भगवान को पाने के तीन सूत्र है वो है हमारा भगवान के प्रति समर्पण (Dedication), विसर्जन और विलय (merging) (क्रमश) ।
रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramahamsa) के अनुसार इन तीनो साधनाओ को करने के लिए नीचे लिखे पाच भावो में से कोई भी एक अपना कर हम भगवन को पा सकते है इनके द्वारा भक्त, अपने भगवान के प्रति, अपनी प्रीति जता सकता –
१. दास भाव - रामकृष्ण परमहंस ने अपनी इस साधना के दौरान जो भाव हनुमान का अपने प्रभु राम से था इसी भाव से उन्होंने साधना की और साधना के अंत में उन्हें प्रभु श्रीराम और माता सीता के दर्शन हुए और वे उनके शरीर में समा गए ।
२. दोस्त भाव - इस साधना में स्वयं को सुदामा मान कर और भगवान को अपना मित्र मानकर की जाती है ।
३. वात्सल्य भाव - 1864 में रामकृष्ण एक वैष्णव गुरु जटाधारी के सनिद्य में वात्सल्य भाव की साधना की, इस अवधि के दौरान उन्होंने एक मां के भाव से रामलला के एक धातु छवि (एक बच्चे के रूप में राम) की पूजा की. रामकृष्ण के अनुसार, वह धातु छवि में रहने वाले भगवान के रूप में राम की उपस्थिति महसूस करते थे ।
४. माधुर्य भाव - बाद में रामकृष्ण ने माधुर्य भाव की साधना की. उन्होंने अपने भाव को कृष्ण के प्रति गोपियों और राधा का रखा. इस साधना के दौरान, रामकृष्ण कई दिनों महिलाओं की पोशाक में रह कर स्वयं को वृंदावन की गोपियों में से एक के रूप में माना. रामकृष्ण के अनुसार, इस साधना के अंत में, वह साथ सविकल्प समाधि प्राप्त की ।
५ . संत का भाव (शांत स्वाभाव) - अन्त में उन्होने संत भाव की साधना की. इस साधना में उन्होंने खुद को एक बालक के रूप में मानकर माँ काली की पूजा की और उन्हें माँ काली की दर्शन हुए ।

संख्या 108 का महत्व

108 का रहस्य ! (The Mystery of 108) वेदान्त में एक
मात्रकविहीन सार्वभौमिक ध्रुवांक
108 का उल्लेख मिलता है जिसका हजारों
वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों
(वैज्ञानिकों) ने अविष्कार किया था l
मेरी सुविधा के लिए मैं मान लेता
हूँ कि, 108 = ॐ (जो पूर्णता का द्योतक
है) प्रकृति में 108 की विविध
अभिव्यंजना : 1. सूर्य और पृथ्वी के
बीच की दूरी/सूर्य का व्यास = 108 = 1 ॐ
150,000,000 km/1,391,000 km = 108 (पृथ्वी और सूर्य के
बीच 108 सूर्य सजाये जा सकते हैं) 2.
सूर्य का व्यास/ पृथ्वी का व्यास = 108 =
1 ॐ 1,391,000 km/12,742 km = 108 = 1 ॐ सूर्य के व्यास पर
108 पृथ्वियां सजाई सा सकती हैं . 3.
पृथ्वी और चन्द्र के बीच की
दूरी/चन्द्र का व्यास = 108 = 1 ॐ 384403 km/3474.20 km
= 108 = 1 ॐ पृथ्वी और चन्द्र के बीच १०८
चन्द्रमा आ सकते हैं . 4. मनुष्य की
उम्र 108 वर्षों (1ॐ वर्ष) में पूर्णता
प्राप्त करती है . वैदिक ज्योतिष के
अनुसार मनुष्य को अपने जीवन काल में
विभिन्न ग्रहों की 108 वर्षों की
अष्टोत्तरी महादशा से गुजरना
पड़ता है . 5. एक शांत, स्वस्थ और
प्रसन्न वयस्क व्यक्ति 200 ॐ श्वास
लेकर एक दिन पूरा करता है . 1 मिनट में
15 श्वास >> 12 घंटों में 10800 श्वास >>
दिनभर में 100 ॐ श्वास, वैसे ही रातभर
में 100 ॐ श्वास 6. एक शांत, स्वस्थ और
प्रसन्न वयस्क व्यक्ति एक मुहुर्त
में 4 ॐ ह्रदय की धड़कन पूरी करता है .
1 मिनट में 72 धड़कन >> 6 मिनट में 432
धडकनें >> 1 मुहूर्त में 4 ॐ धडकनें ( 6
मिनट = 1 मुहूर्त) 7. सभी 9 ग्रह (वैदिक
ज्योतिष में परिभाषित) भचक्र एक
चक्र पूरा करते समय 12 राशियों से
होकर गुजरते हैं और 12 x 9 = 108 = 1 ॐ 8. सभी 9
ग्रह भचक्र का एक चक्कर पूरा करते
समय 27 नक्षत्रों को पार करते हैं और
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते
हैं और 27 x 4 = 108 = 1 ॐ 9. एक सौर दिन 200 ॐ विपल
समय में पूरा होता है. (1 विपल = 2.5
सेकेण्ड) 1 सौर दिन (24 घंटे) = 1
अहोरात्र = 60 घटी = 3600 पल = 21600 विपल = 200 x 108 =
200 ॐ विपल *** 108 का आध्यात्मिक अर्थ *** 1
सूचित करता है ब्रह्म की
अद्वितीयता/एकत्व/पूर्णता को 0
सूचित करता है वह शून्य की अवस्था
को जो विश्व की अनुपस्थिति में
उत्पन्न हुई होती 8 सूचित करता है उस
विश्व की अनंतता को जिसका अविर्भाव
उस शून्य में ब्रह्म की अनंत
अभिव्यक्तियों से हुआ है . अतः
ब्रह्म, शून्यता और अनंत विश्व के
संयोग को ही 108 द्वारा सूचित किया
गया है . जिस प्रकार ब्रह्म की
शाब्दिक अभिव्यंजना प्रणव ( अ उ म् )
है और नादीय अभिव्यंजना ॐ की ध्वनि
है उसी प्रकार ब्रह्म की गाणितिक
अभिव्यंजना 108 है .!!