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Wednesday, 19 January 2011

भगतसिंह ने कहा... 'क्रान्तिकारी सिर्फ़ तर्क में विश्‍वास करते हैं...'

एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्‍वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्‍वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्‍दा, चाहे वह ऊँचे से ऊँचे स्‍तर से की गयी हो, उसे अपने निश्‍ि‍चत उद्देश्‍य-प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्‍य को छोड़ देगा, निरी मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्‍दोलनकारियों ने घोर निन्‍दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फॉंसी के तख्‍़ते पर झूल गये। यदि तुम चाहते हो कि क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को स्‍थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ्‍ा तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाये। यह एक, और केवल यही एक रास्‍ता है, और बाक़ी बातों के विषय में किसी को सन्‍देह नहीं होना चाहिए। क्रान्तिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने से कदापि हार मानने वाला नहीं।
-- 'बम का दर्शन' लेख से

विचार अमर होते हैं___

विचार अमर होते हैं___

भगतसिंह ने कहा़...
हम जनता का ध्‍यान इतिहास में बराबर दोहराये गये इस सबक़ की ओर दिलाना चाहते हैं कि ग़ुलामी और बेबसी से कराहती जनता को कुचलना आसान है, परन्‍तु विचार अमर होते हैं और दुनिया की कोई ताक़त उन्‍हें कुचल नहीं सकती। दुनिया में अनेक बड़े-बड़े साम्राज्‍य नष्‍ट हो गये, परन्‍तु जनसाधारण ने जिन विचारों से प्रेरित होकर इन्‍हें समाप्‍त किया वे आज भी जीवित हैं। बूरबों (फ्रांसीसी राजवंश) मिट गये, पर क्रान्तिकारी सीना ताने चल रहे हैं।

भगतसिंह ने कहा... 'कानून की पवित्रता के बारे में...'

भगतसिंह ने कहा... 'कानून की पवित्रता के बारे में...'

कानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों में एक पुर्जा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्‍व खो बैठता है। न्‍याय प्रदान करने के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का खात्‍मा होना चाहिए। ज्‍यों ही कानून सामाजिक आवश्‍यकताओं को पूरा करना बन्‍द कर देता है त्‍यों ही जुल्‍म और अन्‍याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे कानूनों को जारी रखना सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्‍भपूर्ण जबरदस्‍ती के सिवाय कुछ नहीं है।

-- भगतसिंह के पत्र से