Friday, 3 December 2010

एकमेव मार्ग श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन ( sorya divas छह दिसम्बर 1992)


एकमेव मार्ग श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन

जून 1992, दिसम्बर 1992 और फरवरी 1993 में जमीन से प्राप्त पुरावशेष सरकार के कब्जे में हैं। छह दिसम्बर 1992 को प्राप्त शिलालेख सरकार के नियंत्रण में हैं। उसका छाप अदालत में सुरक्षित है। शिलालेख का पाठ विशेषज्ञों से पढ़वाया जा चुका है। राडार तरंगों से किए गए सर्वेक्षण रिपोर्ट की पुष्टि पुरातात्विक उत्खनन से हो चुकी है। भारत सरकार इस विवाद को हमेशा खत्‍म करने के लिए कानून बनाकर और यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप कर सांस्कृतिक स्वातंत्र्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  


वार्तालाप के दौर अनेक बार हो चुके। चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में मुस्लिम व यूरोपीय इतिहासकारों के प्रमाण, राजस्व सम्बन्धी प्रमाण एवं हिन्दू समाज की परम्पराओं से सम्बंधित प्रमाण सरकार को सौंपे जा चुके हैं। जून 1992, दिसम्बर 1992 और फरवरी 1993 में जमीन से प्राप्त पुरावशेष सरकार के कब्जे में हैं। छह दिसम्बर 1992 को प्राप्त शिलालेख सरकार के नियंत्रण में हैं। उसका छाप अदालत में सुरक्षित है। शिलालेख का पाठ विशेषज्ञों से पढ़वाया जा चुका है। राडार तरंगों से किए गए सर्वेक्षण रिपोर्ट की पुष्टि पुरातात्विक उत्खनन से हो चुकी है। भारत सरकार इस विवाद को हमेशा खत्‍म करने के लिए कानून बनाकर और यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप कर सांस्कृतिक स्वातंत्र्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  

6 एकमेव मार्ग श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन


एकमेव मार्ग श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन

जून 1992, दिसम्बर 1992 और फरवरी 1993 में जमीन से प्राप्त पुरावशेष सरकार के कब्जे में हैं। छह दिसम्बर 1992 को प्राप्त शिलालेख सरकार के नियंत्रण में हैं। उसका छाप अदालत में सुरक्षित है। शिलालेख का पाठ विशेषज्ञों से पढ़वाया जा चुका है। राडार तरंगों से किए गए सर्वेक्षण रिपोर्ट की पुष्टि पुरातात्विक उत्खनन से हो चुकी है। भारत सरकार इस विवाद को हमेशा खत्‍म करने के लिए कानून बनाकर और यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप कर सांस्कृतिक स्वातंत्र्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  


वार्तालाप के दौर अनेक बार हो चुके। चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में मुस्लिम व यूरोपीय इतिहासकारों के प्रमाण, राजस्व सम्बन्धी प्रमाण एवं हिन्दू समाज की परम्पराओं से सम्बंधित प्रमाण सरकार को सौंपे जा चुके हैं। जून 1992, दिसम्बर 1992 और फरवरी 1993 में जमीन से प्राप्त पुरावशेष सरकार के कब्जे में हैं। छह दिसम्बर 1992 को प्राप्त शिलालेख सरकार के नियंत्रण में हैं। उसका छाप अदालत में सुरक्षित है। शिलालेख का पाठ विशेषज्ञों से पढ़वाया जा चुका है। राडार तरंगों से किए गए सर्वेक्षण रिपोर्ट की पुष्टि पुरातात्विक उत्खनन से हो चुकी है। भारत सरकार इस विवाद को हमेशा खत्‍म करने के लिए कानून बनाकर और यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप कर सांस्कृतिक स्वातंत्र्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्‍या (सोमनाथ मन्दिर का निर्माण सरदार पटेल की राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, यदि प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू का सोमनाथ मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उपस्थित रहना उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, तो श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आन्दोलन भी राष्ट्रभक्ति का ही प्रतीक है। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन यह किसी मन्दिर को प्राप्त करने की सामान्य लड़ाई नहीं है। कभी भी न बदलने वाली जन्मभूमि को प्राप्त करने का यह संघर्ष है। जन्मभूमि भी एक ऐसे महापुरुष की जिसे कोटि-कोटि हिन्दू भगवान के रूप में पूजता है, मृत्यु के समय भी जिस नाम के उच्चारण की लालसा रखता है। इससे भी अधिक यह संघर्ष विदेशी इस्लामिक आक्रमणकारी के कलंक को मिटाने का संघर्ष है, यह संघर्ष हिन्दू समाज की सांस्कृतिक आजादी की लड़ाई है।)

राम जन्मभूमि फैसला किसी की हार-जीत नहीं : भागवत sorya divas 6 des. 1992 ko yaad kare




फैसला किसी की हार-जीत नहीं : भागवत
नई दिल्ली। अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच का फैसला आने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि फैसले से राष्ट्रीय एकता को प्रदर्शित करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि पिछली सारी कटुता को भूलकर अब सभी को मिलजुल कर मंदिर निर्माण के काम में जुट जाना चाहिए। भागवत ने कहा कि इस फैसले को किसी की जीत या फिर किसी की हार के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि सभी इस फैसले पर संयम बरतें और पूर्ण शांति बनाए रखें। किसी के दिल को ठेस पहुंचे, ऎसा कोई काम न किया जाए।
उन्माद की कोई जगह नहीं
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या पर फैसला का स्वागत किया है। मोदी ने कहा कि फैसले को लेकर जो उत्सुकता थी वह अब खत्म हो गई है। सभ्य समाज में उन्माद के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। फैसले को भारत के सम्मान के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। इसे किसी जाति और सम्प्रदाय से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। 
लखनऊ हाईकोर्ट परिसर किले में तब्दील लखनऊ। बहुप्रतीक्षित अयोध्या फैसले के मद्देनजर लखनऊ में सुरक्षा के कडे प्रबंध किए गए हैं। प्रशासन ने इलाहाबाद की लखनऊ पीठ को एक किले के रूप में तब्दील कर दिया गया है। उच्च न्यायालय परिसर के निकट होने के कारण कैसरबाग बस अड्डा बंद रहेगा। धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा पहले से लागू है। उच्च न्यायालय परिसर और आसपास के क्षेत्रों को छोड़कर शेष नगर में रोजमर्रा की तरह कामकाज होगा।

 
फैसले के दिन भी कर सकेंगे रामलला के दर्शन लखनऊ। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के दिन यानी गुरूवार को श्रद्धालुओं के अयोध्या में रामलला के दर्शन पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट एम.पी. अग्रवाल ने बुधवार को कहा कि वहां रामलला के दर्शन पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा।

अग्रवाल ने कहा कि किसी भी अन्य दिन की तरह फैसले के दिन भी श्रद्धालु दर्शन के लिए आ सकते हैं। यहां सब कुछ सामान्य है। फैजाबाद लखनऊ से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित है।


 
शायद अन्तिम फैसला होगा सर्वाधिक महत्वपूर्ण
लखनऊ। न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने शायद ही सोचा होगा कि उनका अन्तिम फैसला न सिर्फ महत्वपूर्ण होगा बल्कि ऎतिहासिक भी। 


वर्ष 1982 बैच के पीसीएस.जे. शर्मा को 1985 में उच्च न्यायिक सेवा में प्रोन्नति मिली थी। वे 20 अक्टूबर 2005 को एडिशनल जज बने और 17 सितम्बर 2007 को उनकी नियुक्ति स्थाई जज के रूप में हो गई। उत्तर प्रदेश में वह संसदीय कार्य और न्याय विभाग में प्रमुख सचिव भी रहे।

इन चार बिन्दुओं पर होना है फैसला

इस मामले में न्यायालय को मुख्यरूप से चार बिंदुओं को संज्ञान में लेकर अपना निर्णय सुनाना है। पहला विवादित धर्मस्थल पर मालिकाना हक किसका है। दूसरा राम जन्मभूमि वहीं है या नहीं। तीसरा क्या 1528 में मन्दिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनी थी और चौथा यदि ऎसा है तो यह इस्लाम की परम्पराओं के खिलाफ है या नहीं।

13 बार पीठ बदली
अयोध्या के ऎतिहासिक मुकदमे की इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में 21 साल चली सुनवाई के दौरान 13 बार बेंच बदली और इसमें 18 न्यायाधीश बदले गए। बेंच में बदलाव न्यायाधीशों के रिटायर होने या तबादला होने अथवा पदोन्नति के कारण करना पड़ा।

देश के सबसे बडे मुकदमों
लिब्रहान आयोग का 17 साल लम्बा सफर
विवादित ढांचा गिराए जाने की जांच के लिए 16 दिसंबर 1992 को लिब्रहान आयोग का गठन किया गया था। कहा गया था कि यह आयोग तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगा, लेकिन आयोग का कार्यकाल बढ़ता रहा। जून 2006 ने आयोग ने अपनी सुनवाई पूरी की। आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह और मुलायम सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित बहुत से नेताओं के बयान दर्ज किए।

आखिरकार 17 साल बीतने के बाद 30 जन को केन्द्र सरकार को सौंपी तथा करीब छह माह बाद नवम्बर 2009 रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी गई। आयोग की रपट संसद में पेश किए जाने से पहले ही मीडिया को लीक हो जाने से संसद में खासा हंगामा भी हुआ। यह भी खास बात रही कि लिब्रहान आयोग ने देश के अब तक के महंगे आयोगों में से एक हो गया। आयोग को मूलत: 16 मार्च 1993 में रिपोर्ट दे देनी थी लेकिन इसे लगभग 48 बार विस्तार दिया गया। आयोग ने करीब 400 बैठकें की। आयोग पर कुल आठ करोड़ से भी ज्यादा खर्च आया।



Wednesday, 1 December 2010

।। उपनिषदामृतम् ।।

ष

ईशावास्यमिदं सर्वँ यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ 
( ईशावास्‍योपनिषद् -1 ) 

एकं दृश्यं द्वौ विचारौ



एकं दृश्यं द्वौ विचारौ

नेहा राहुलः च मातृ-पितृभ्यां सह शिवालयं गच्छतः स्म ।  नगरात् बहिः मार्गे तैः एकः आम्रवृक्षः दृष्टः ।  वृक्षस्य शाखासु बहूनि आम्रफ़लानि आसन् ।  वृक्षस्य अधः कश्चन मनुष्यः यष्ट्या शाखासु ताडयन् आम्रफ़लानि पातयति स्म ।  नेहा राहुलः च एतद् दृश्यं अवलोकयतः स्म ।  प्रहारं कृत्वा अपि फ़लम् न पतितं चेत् सः वारंवारं बलेन प्रहारं करोति स्म ।

"एतद् दृष्ट्वा भवतोः मनसोः के के विचाराः आगताः?"---- पिता पृष्टवान् ।

" सः मनुष्यः शाखासु यष्ट्या ताडयन् अस्ति ।  तदा एव वृक्षतः आम्रफ़लं पतति ।  यत् किमपि वयम् इच्छामः तत् प्राप्तुम् आक्रमणम् आवश्यकम् इति अहं मन्ये।"---राहुलः उक्तवान्।

" मम विचारः भिन्नः ।  यद्यपि सः वृक्षं ताडयति तथापि वृक्षः फ़लानि एव ददाति तस्मै ।  " ------नेहा विचारं प्रकटितवती ।
" शोभनम् ।  नेहे , उत्तमः विचारः ।  वृक्षः परोपकारार्थम् एव जीवति ।  मरणोत्तरम् अपि परोपकारम् एव करोति ।
राहुल, एषः तु अस्माकं पुरतः आदर्शः ।  " --- माता उक्तवती।

श्रीमद्भगवद्गीता - शारदा महोदयया प्रेषिता: श्‍लोका: ।।








1- यदा संहरते चायं कुर्मोंगानीव सर्वश:, 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता.


2- विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:
रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 


3- यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:
इन्द्रियाणि प्रमाथिनी हरन्ति प्रसभम मन: ।।


4- तानिं सर्वाणि संयभ्य युक्त आसीत् मत्पर:
वशे हि यस्येद्रियाणि तस्य प्रज्ञां प्रतिष्ठा  ।।

श्रीमद्भगवद्गीता- केचन् श्‍लोका: शारदा महोदयया प्रेषिता: ।।

1-सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि


2-कर्मण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो अस्त्वकर्मणि.


श्रीकृष्ण उवाच:
3-प्रजहाति यदा कामान सर्वानपार्थ मनोगतान,
आत्मन्येवात्मना तुष्ट:स्थित्धिर्मनोरुच्यते? 


4-दु:खेश्व्नुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:,
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते !!