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Friday, 31 December 2010

मदन मोहन मालवीय :: :: भारतमाता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने में जिन वीर सपूतों का योगदान रहा, उनमे पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम उल्लेखनीय है।

मदन मोहन मालवीय ::  :: भारतमाता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने में जिन वीर सपूतों का योगदान रहा, उनमे पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम उल्लेखनीय है।

भारतमाता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने में जिन वीर सपूतों का योगदान रहा, उनमे पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम उल्लेखनीय है। इनका जन्म 25 दिसम्बर 1861 को प्रयाग में हुआ था। इनके पिता पंडित ब्रजनाथ संस्कृत के आचार्य थे और माता श्रीमती मोना देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं।
मदन मोहन बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि थे। बचपन में उनके पिताजी ने उन्हें घर पर ही शिक्षा देनी शुरू की। उसके बाद उनका दाखिला प्रयाग की एक पाठशाला में करा दिया गया। अपनी कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा के बल पर जल्द ही उन्होंने पाठशाला में अपनी पहचान एक मेधावी छात्र के रूप में बना ली। पाठशाला में उन्हें हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति के बारे में शिक्षा दी गयी। मदन मोहन मन लगाकर पढ़ते थे। पढ़ते समय वे इतने मग्न हो जाते थे कि उन्हें खाने -पीने की भी सुध नहीं रहती थी। घर में एकांत स्थान न होने के कारण वे प्रायः अपने सहपाठी के घर जाकर पढ़ते थे।
उस समय भारत पर अंग्रेजो का शासन था और देश की स्थिति बहुत गंभीर और दयनीय हो चुकी थी। अंग्रेजी विद्यालयों में हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति के विरोध में बहुत दुष्प्रचार होता था। मदन मोहन जब भारत की दुर्दशा और अंग्रेजो के अत्याचार के बारे में सोचते थे तो उनका मन अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर जाता था। उनके संस्कारों ने उन्हें देशभक्ति का पाठ पढाया। हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रति मदन मोहन का गहरा लगाव था। इसका विरोध वे चुपचाप सहन न कर सके। उन्होंने अपने कुछ साथियों के मदद से 'वाग्वर्धिनी सभा' की  स्थापना की। इस सभा के माध्यम से  
उन्होंने जगह -जगह भाषण देकर अंग्रेजो द्वारा हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध किये जाने वाले प्रचार का विरोध किया।

पढाई के प्रति मदन मोहन की रूचि बढती जा रही थी। अपनी मेहनत के बल पर वे लगातार सफल होते गए। कलकत्ता विश्वविद्यालय से दाखिले की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद म्योर सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लेना चाहते; लेकिन घर की स्थिति अच्छी न होने के कारण उन्होंने उच्च शिक्षा का विचार त्याग दिया। उनके पिता इस इच्छा को भांप गए। वे नहीं चाहते थे कि उनके पुत्र को पढाई में किसी प्रकार का समझौता करना पड़े। उन्होंने मदन मोहन का दाखिला म्योर सेंट्रल कॉलेज में ही करा दिया। मदन मोहन की पढाई के दौरान उन्होंने किसी वस्तु का अभाव नहीं होने दिया। म्योर सेंट्रल कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक पंडित आदित्यराम भट्टाचार्य ने उन्हें संस्कृत के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया। मदन मोहन मालवीय अंग्रेजी सभ्यता के विरोधी थे। उन्होंने उन युवकों को, जो अंग्रेजी सभ्यता के पीछे भाग रहे थे, बहुत समझाया। इस दिशा में उन्होंने एक प्रहसन लिखा था ---'जेंटलमैन' इस प्रहसन में उन्होंने अंग्रेजी सभ्यता की खिल्ली उड़ाई थी।

पढा
ई करने के उपरांत उन्हें एक विद्यालय में अध्यापक की नौकरी मिल गयी। मालवीयजी के सभी छात्र उनका बहुत सम्मान करते थे। उनकी शिक्षण - शैली इतनी सुरुचिपूर्ण थी कि छात्रों को उनका पढाया हुआ पाठ पूरी तरह समझ आ जाता था। अध्यापन काल में भी मालवीयजी ने सामाजिक और राजनीतिक कार्यो में रूचि बनाए रखी। अब उनकी सामाजिक रुचियों का दायरा प्रयाग से निकलकर देश के विभिन्न नगरों तक फैलने लगा। वे अपने सेवा- क्षेत्र में पूरे भारत वर्ष को शामिल करना चाहते थे। सन 1886 में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन कलकत्ता में होने जा रहा था, तो मालवीय जी अपने गुरु पं. आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ उसमें शामिल होने के लिए गए। यह अधिवेशन मालवीय जी के वास्तविक राजनीतिक जीवन का शुभारम्भ था। अधिवेशन में उनके ओजस्वी भाषण को सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग मालवीय जी से बहुत प्रभावित हुए। मालवीय जी के भाषण और उनके विचारों से कालाकांकर राजा रामपाल सिंह इतने प्रभावित हुए की उन्होंने मालवीय जी को 'हिंदुस्तान' पत्र का संपादक बना दिया। उस समय मालवीय जी ने उनसे कहा ,"राजा साहब, मैं ब्राह्मण हूँ। मेरे कुछ नियम है, परम्पराएं है। आपका प्रस्ताव मैं इस शर्त पर स्वीकार कर सकता हूँ कि जब आप मदिरा का सेवन किये हों तो मैं आपके पास नहीं आऊँगा।" राजा साहब ने शर्त मान ली।

सन 1887 में मालवीय जी ने अध्यापक पद से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे कालाकांकर जाकर 'हिंदुस्तान' पत्र का संपादन करने लगे। यहाँ उनके व्यक्तित्व का एक विराट पक्ष उभरकर सामने आया। मालवीय जी के संपादन में 'हिंदुस्तान' ने बड़ी ख्याति अर्जित की। उनके प्रभावित लेखों को जन मानस बड़ी रूचि से पढता था। पत्र में जनता और सरकार, दोनों की कमियों और उपलब्धियों पर निष्पक्ष एवं निर्भीकतापूर्वक लेख छपते थे। मालवीय जी ने ढाई वर्ष तक 'हिंदुस्तान' का संपादन किया। इस अवधि में उन्होंने पत्र को एक सामाजिक दर्जा दिलवाने में सफलता प्राप्त की। सन 1889 में वे कालाकांकर छोड़कर प्रयाग आ गये। वहां उन्हें अंग्रेजी पत्र 'इंडियन ओपेनियन' के संपादन का कार्य किया। संपादन के साथ-साथ मालवीय जी देश की सामाजिक समस्याओं को दूर करने के बारे में भी सोचते थे। भारतीयों में हिन्दू धर्म संस्कृति के प्रति जागरूकता लाने के लिए वे एक हिन्दू विश्वविधालय स्थापित करना चाहते थे। अपने इस विचार को जनमानस तक पहुँचाने के उददेश्य से उन्होंने पत्र 'अभ्युदय' का प्रकाशन आरम्भ कर दिया। इस पत्र के माध्यम से वे जनमानस को शिक्षा एवं विद्यालयों की आवश्यकता से अवगत कराते रहते थे और साथ ही तत्कालीन प्रमुख समस्याओं पर लेख भी लिखते थे।

शिक्षा और सुधार कार्यों के नाम पर अंग्रेज अधिकारी हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करते थे। अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने के लिए वे ज्यादा से ज्यादा हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन का प्रलोभन देते थे। यह सब देखकर मालवीय जी को बड़ा दुःख होता था। वे किसी भी धर्म को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे। उनकी दृष्टि में सभी धर्मों में मानवता का सन्देश निहित है; परन्तु किसी एक धर्म की श्रेष्ठता बताने के लिए दूसरे धर्म का अपमान करना उन्हें सहन नहीं था। मालवीय जी एक शिक्षित और धार्मिक परिवार में पैदा हुए थे, इसलिए बचपन से ही उनके हृदय में हिन्दू संस्कार कूट-कूटकर भरे हुए थे। मालवीय जी ने निश्चय किया कि वे हिंदुत्व की रक्षा के लिए संघर्ष करेंगे। सन 1906 में मालवीय जी ने कुम्भ के पावन पर्व पर 'सनातन धर्म महासभा' का शुभारम्भ किया। इसी समय 'काशी विश्विद्यालय' की स्थापना का प्रस्ताव भी पारित हुआ।

मालवीय जी के कुछ मित्रों ने उन्हें वकालत पढने और वकालत के माध्यम से देश सेवा करने के लिए प्रेरित किया। मित्रों के आग्रह पर मालवीय जी वकालत की पढाई करने लगे। उस समय वे 'इंडियन ओपिनियन' में सह संपादक थे। मालवीय जी वकालत की परीक्षा की तैयारी करने लगे। वकालत की परीक्षा में वे उत्तीर्ण हुए। मालवीय जी प्रयाग उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। कुछ दिनों में ही उन्होंने कई मुक़दमे जीतकर सभी को हतप्रभ कर दिया। वकालत में मालवीय जी ने खूब ख्याति अर्जित की। धीरे-धीरे उनका नाम देश के उच्चकोटि के वकीलों में लिया जाने लगा। मालवीय जी कभी झूठा मुकदमा नहीं लेते थे। वे अत्यंत कुशाग्र होने के साथ-साथ परम विवेकी भी थे। वे अपने तर्कों को इतने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते कि विरोधी पक्ष के वकील को उसके खंडन की कोई युक्ति नहीं मिलती थी। वकालत से मालवीय जी को जो उपलब्धि हासिल हुई, उससे न तो उनके मन में कभी अहंकार का भाव आया और न ही उन्होंने उसे अपनी अंतिम उपलब्धि माना। उनके हृदय में तो तीव्र आकांक्षाएं थी। उनका सबसे बड़ा स्वप्न काशी हिन्दू विश्विद्यालय की स्थापना करना था। उनके पिता ने उनसे कहा था कि यदि तुम्हें अपना यह स्वप्न पूर्ण करना है तो वकालत छोडनी पड़ेगी। मालवीय जी ने कुछ समय बाद ही वकालत छोड़ दी।

सन 1907 में काशी नरेश की अध्यक्षता में आयोजित एक सभा में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। सभा में उपस्थित कई सदस्यों ने इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त किया; लेकिन अंत में यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। प्रस्ताव की स्वीकृति से मालवीय जी का उत्साह बढ गया। वे इस योजना को कार्यान्वित करने के प्रयासों में जुट गए। विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य शुरू करने में काफी धन की आवश्यकता थी। कोई अकेला व्यक्ति इतना धन नहीं दे सकता था। मालवीय जी ने निश्चय किया कि वे पूरे देश में घूम -घूमकर विश्वविद्यालय के लिए धन राशि एकत्र करेंगे। मालवीय जी ने पूरे देश का दौरा करना शुरू कर दिया। वे विश्वविद्यालय के मानचित्र को साथ ले कर चलते थे और घर-घर जाकर अपनी राष्ट्रीय शिक्षा योजना के बारे में बताते थे। वे जहाँ-जहाँ भी गए; उन्हें विश्वविद्यालय के लिए दान में कुछ न कुछ अवश्य मिला। 4 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया गया। उसके उदघाटन समारोह में गांधीजी सहित देश-विदेश के कई गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।

सन 1919 में अंग्रेजी सरकार ने रोलट एक्ट पारित किया। इस एक्ट में समस्त भारतीयों की मानवीय अस्मिता का मखौल उड़ाया गया था। मालवीय जी ने इसका विरोध करते हुए विधान परिषद् में उत्तेजित भाषण दिए। गांधीजी ने भी इस एक्ट का विरोध करते हुए घोषणा की, 'यदि इस एक्ट को स्वीकार किया गया तो मैं सत्याग्रह आन्दोलन शुरू कर दूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी हो।' रोलट एक्ट के विरोध के लिए पंजाब के जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। वहां एकत्रित हजारों लोगों पर जनरल डायर ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। आदेश पाते ही अंग्रेज सैनिकों ने गोली चला दी। इसमें सैंकड़ों निर्दोष भारतीय मारे गए और अनेक घायल हुए। अंग्रेजो के इस कुकृत्य से पूरा देश स्तब्ध रह गया। देश भर में इन्कलाब की लहर दौड़ गयी। मालवीय जी ने विधान सभा में उपस्थित होकर जोरदर शब्दों में इसका विरोध किया। अपने तर्कों से उन्होंने इस हत्याकांड को अनधिकृत और अमानवीय सिद्ध किया। इस सम्बन्ध में मालवीय जी ने सरकार को भी आरोपी सिद्ध किया।

मालवीय जी हृदय में दीन-दुखियों के लिए अपार सहानुभूति थी। एक बार मालवीयजी प्रयाग में शाम के समय घूम रहे थे। रास्ते में चलते हुए उन्हें एक भिखारिन दिखाई पड़ी। वह बहुत वृद्ध हो चुकी थी और पीड़ा से कराह रही थी। मालवीय जी ने उसके पास जाकर पूछा ,"आपको क्या कष्ट है माताजी?" मालवीय जी के अपनत्व भरे शब्दों को सुन कर भिखारिन के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। कराहते हुए उसने बताया,"मेरे शरीर में घाव हो गए हैं। मेरे परिवार वालों ने मुझे त्याग दिया है।" सड़क पर आते-जाते लोगों ने मालवीय जी को भिखारिन के पास खड़े देखा तो वहां भीड़ लग गयी। कई लोग भिखारिन के कटोरे में सिक्के डालने लगे। मालवीय जी ने कहा,"मित्रों! इन्हें धन की नहीं, चिकित्सा की आवश्यकता है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है क़ि हमारे बुजुर्ग इस तरह त्याग दिए जाते हैं।" मालवीय जी ने उस वृद्धा को तांगेपर बिठाया और इलाज के लिए अस्पताल तक पहुँचाया।

मालवीय जी ने शिक्षा के बाद जिस विषय पर सबसे ज्यादा प्रभावशाली भाषण दिया, वह 'शर्तबंद कुली प्रथा' थी। मालवीय जी ने इस प्रणाली का विरोध वायसरॉय लोर्ड हार्डिंग के समय में किया। उन्होंने लोर्ड हार्डिंग के समक्ष इस प्रणाली को तत्काल समाप्त करने की अपील की। इस प्रणाली को समाप्त करने के लिए दिए गए भाषण में उन्होंने कहा था -"इस प्रणाली ने पिछले कई सालों से समाज का शोषण किया है। हमारे कितने ही भाई-बहन इस विनाशकारी प्रणाली के शिकार बने और कितने शारीरिक व मानसिक यातना भुगत रहे है। अब समय आ गया है क़ि इस प्रणाली को समाप्त कर देना चाहिए।" मालवीय जी का प्रयास सफल रहा और लोर्ड हार्डिंग ने इस प्रणाली को समाप्त करने घोषणा कर दी।

मालवीयजी हर परिस्थिति में निर्भय और आशावादी रहते थे। उनकी आशावादिता उन्हें ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों को भी लाभान्वित करती थी। एक बार पं शिवराम जी के भतीजे काशीप्रसाद गंभीर रूप से बीमार हुए। उन्हें तेज बुखार था। पं शिवराम जी बहुत चिंतित थे। वे मालवीयजी में गहरी आस्था रखते थे। उनका विचार था की एक बार यदि मालवीय जी रोगी के सिर पर हाथ रख दें तो वह अवश्य ही स्वस्थ हो जाएगा। मालवीय जी के किसी मित्र ने इसके बारे में बताया। मालवीय जी तुरंत शिवराम जी के यहाँ पहुंच गए। मालवीय जी ने रोगी के पिता से कहा ,"चिंता करने की कोई बात नहीं, यह अभी अच्छा हो जाएगा।" मालवीय जी के शब्दों का चमत्कार था या आस्था का आदर, यह बताना तो मुश्किल है, लेकिन रोगी आधे घंटे बाद ही स्वस्थ होने लगा।

मालवीयजी में मानवता कूट-कूटकर भरी हुई थी। उनके हृदय में देश और देशवासियों के प्रति अपार स्नेह था। उन्होंने शिक्षा, धर्म और राजनीति  सभी क्षेत्रों में अग्रणी योगदान दिया।" जीवन भर देश की सेवा में लगे रहने वाले, मानवता के पुजारी महामना मदन मोहन मालवीय जी नवम्बर 1946 में परमात्मा में विलीन हो गए।


Friday, 17 December 2010

लोकमान्य तिलक : : उन्होंने "आर्यों का आर्कटिक घर" नामक पुस्तक में खगोल शास्त्र के उद्धरण देकर साबित किया कि वेद आर्कटिक क्षेत्र में लिखे गए थे। इसके अलावा उन्होंने गीतारहस्य और जीवन का हिन्दू दर्शन नामक किताबें भी लिखी हैं।

प्रारम्भिक जीवन

लोकमान्य तिलक

  

लोकमान्य तिलक  : :  : : :गीतारहस्य और जीवन का हिन्दू दर्शन नामक किताबें भी लिखी हैं।
  • राजेन्द्र सिंह चौहान
तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक गाँव में हुआ था। ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की ताकि भारत में शिक्षा का स्तर सुधरे।

स्वतंत्रता संग्राम

बालगंगाधर तिलक
तिलक ने मराठी में केसरी नामक दैनिक समाचार पत्र शुरु किया जो जल्दी ही जनता में बहुत लोकप्रिय हो गया। तिलक ने अंग्रेजी सरकार की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।
तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्दी ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गई। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। 1908 में तिलक ने क्रांतिकारी प्रफुल्ल चकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) में जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1916-18 में ऐनी बीसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रुल लीग की स्थापना की।

समाज सुधार

 

तिलक ने भारतीय समाज में कई सुधार लाने के प्रयत्न किए। वे बाल-विवाह के विरुद्ध थे। उन्होंने हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। महाराष्ट्र में उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव की परम्परा प्रारम्भ की ताकि लोगों तक स्वराज का सन्देश पहुँचाने के लिए एक मंच उपलब्ध हो। भारतीय संस्कृति, परम्परा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत हुई। उनके निधन पर लगभग 2 लाख लोगों ने उनके दाह-संस्कार में हिस्सा लिया।

पुस्तकें                                                                                                  

 

तिलक ने वेदों के इतिहास के बारे में एक पुस्तक लिखी जिसे काफ़ी सराहा जाता है। उन्होंने "आर्यों का आर्कटिक घर" नामक पुस्तक में खगोल शास्त्र के उद्धरण देकर साबित किया कि वेद आर्कटिक क्षेत्र में लिखे गए थे। इसके अलावा उन्होंने गीतारहस्य और जीवन का हिन्दू दर्शन नामक किताबें भी लिखी हैं।
  • राजेन्द्र सिंह चौहान

Tuesday, 14 December 2010

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी वीरों में बड़े सम्मान व श्रद्धा के साथ लिया जाता है। अत्यंत निडरता से सशस्त्र उपायों द्वारा सुभाष चन्द्र बोस ने जिस प्रकार अंग्रेजों का मुकाबला किया उसके जैसा अन्य कोई उदाहरण नहीं मिलता है।

 

सुभाष चन्द्र बोस

 
देश को ‘जयहिन्द’ का नारा देने वाले तथा इसी ललकार के साथ अंग्रेजों का डटकर सामना करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी वीरों में बड़े सम्मान व श्रद्धा के साथ लिया जाता है। अत्यंत निडरता से सशस्त्र उपायों द्वारा सुभाष चन्द्र बोस ने जिस प्रकार अंग्रेजों का मुकाबला किया उसके जैसा अन्य कोई उदाहरण नहीं मिलता है।


महान देशभक्त और कुशल नेता सुभाष चन्द्र बोस की जीवन गाथा आज भी सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, वर्ष 1897 को कटक में हुआ था। इनके पिता रायबहादुर जानकी नाथ बसु प्रसिद्ध सरकारी वकील थे तथा समाज में उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी।


सुभाष की माता प्रभावती देवी धार्मिक विचारों वाली समझदार घरेलू महिला थी। परिवार में सुख सुविधा के लगभग सभी साधन उपलब्ध थे, किन्तु सुभाष अपने बाल्यकाल से ही अपने परिवार के सुखमय वातावरण और परिजनों से अलग खोए-खोए से रहते थे। 
 

सरदार बल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व एवं विचारों का सजीव चित्रण

 

सरदार बल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व एवं विचारों का सजीव चित्रण 

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह असीम शक्ति से उन्होंने नवजात गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया।

आमुख

फ्रैंक मोराएस ने लिखा है : ‘‘एक विचारक आपका ध्यान आकर्षित करता है; एक आदर्शवादी आदर का आह्वान करता है, पर कर्मठ व्यक्ति, जिसको बातें कम और काम अधिक करने का श्रेय प्राप्त होता है, लोगों पर छा जाने का आदी होता है, और पटेल एक कर्मठ व्यक्ति थे।’’

सरदार पटेल भारत के देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थे। वे भारत के राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में अक्षम शक्ति स्तम्भ थे। आत्म-त्याग, अनवरत सेवा तथा दूसरों को दिव्य-शक्ति की चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश-स्तम्भ की अमर ज्योति रहेगा। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। इस मितभाषी, अनुशासनप्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीतिक सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति, मानवीय समस्याओं के प्रति व्यवहारिक दृष्टिकोण से उन्होंने निर्भय होकर नवजात गणराज्य की प्ररम्भिक कठिनाइयों का समाधान अद्भुत सफलता से किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया।


सरदार पटेल मन, वचन तथा कर्म से एक सच्चे देशभक्त थे। वे वर्ण-भेद तथा वर्ग-भेद के कट्टर विरोघी थे। वे अन्तःकरण से निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासन प्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय अलंकरण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था। संघर्ष को वे जीवन की व्यस्तता समझते थे। गांधीजी के कुशल नेतृत्व में सरदार पटेल का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। स्वतन्त्रता उपरान्त अदम्य साहस से उन्होंने देश की विभिन्न रियासतों का विलीनीकरण किया तथा भारतीय प्रशासन की निपुणता तथा स्थायित्वता प्रदान किया।


सरदार पटेल का व्यक्तित्व विवादास्पद रहा है। प्रायः उन्हें ‘असमझौतावादी’’, ‘पूँजी समर्थक’, ‘मुस्लिम विरोधी’, तथा ‘वामपक्ष विरोधी’ कहा जाता है। इस शोध-प्रबन्ध में सरदार पटेल की राजनीतिक भूमिका, योगदान तथा चिंतन का सही विश्लेषण किया गया है तथा भ्रान्तियाँ दूर करने का प्रयास किया गया है। अध्ययन का लक्ष्य पक्षपातों तथा पूर्वाग्रहों से रहित वास्तविक तथ्यों को प्रस्तुत करना है।


 



जीवन परिचय


भारतीय राष्ट्रीय अन्दोलन की वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। इस मितभाषी, अनुशासनप्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीतिक सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति, मानवीय समस्याओं के प्रति व्यवहारिक दृष्टिकोण से उन्होंने निर्भय होकर नवजात गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान अद्भुत सफलता से किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया।

1. प्रारम्भिक जीवन एवं प्रेरणा स्रोत

वल्लभभाई पटेल के प्रारम्भिक जीवन का इतिहास अधिक उत्तेजनीय नहीं है। यह घटना रहित जीवन है।1 बालक वल्लभभाई का जन्म अपनी ननसाल नड़ियाद में हुआ था। हाईस्कूल प्रमाण-पत्र के आधार पर उनकी जन्म तिथि 31 अक्टूबर, 1875 है। वल्लभभाई के पिता झबेरभाई गुजरात प्रान्त में बोरसद ताल्लुके के करमसद ग्राम के एक साधारण कृषक थे। करमसद ग्राम के इर्द-गिर्द मुख्यतः दो उप-जातियाँ ‘लेवा’ और ‘कहवा’ निवास करती हैं। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के वीर पुत्रों लव और कुश से बताई जाती है। सरदार वल्लभभाई पटेल लेवा उपजाति से सम्बन्धित थे, वे पटेल जाति से कुरमी क्षत्री थे।

वल्लभभाई के पिता झबेरभाई साहसी, संयमी एवं वीर पुरुष थे। सन् 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम आन्दोलन में उन्होंने अपनी युवावस्था में मातृभूमि की सेवा में अपने को अर्पित कर दिया था। कहा जाता है कि घरवालों को बिना बताए वे तीन साल लापता रहे। उन्होंने झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई तथा नाना साहब घोड़ोपन्त की सेनाओं में भाग लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध भी किया था।2


झबेरभाई एक धर्म परायण व्यक्ति थे। गुजरात में सन् 1829 में स्वामी सहजानन्द द्वारा स्थापित स्वामी नारयण पंथ के वे परम भक्त थे। पचपन वर्ष की अवस्था के उपरान्त उन्होंने अपना जीवन उसी में अर्पित कर दिया था।

वल्लभभाई ने स्वयं कहा है : ‘‘मैं तो साधारण कुटुम्ब का था। मेरे पिता मन्दिर में ही जिन्दगी बिताते थे और वहीं उन्होंने पूरी की।’’

वल्लभाभाई की माता लाड़बाई अपने पति के समान एक धर्मपरायण महिला थी। वल्लभभाई पाँच भाई व एक बहन थे। भाइयों के नाम क्रमशः सोभाभाई, नरसिंहभाई, विट्ठलभाई, वल्लभभाई और काशीभाई थे। बहन डाबीहा सबसे छोटी थी। इनमें विट्ठलभाई तथा वल्लभभाई ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेकर इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया। माता-पिता के गुण संयम, साहस, सहिष्णुता, देश-प्रेम का प्रभाव वल्लभभाई के चरित्र पर स्पष्ट था।


वल्लभभाई का लालन-पालन विशुद्ध ग्रामीण वातावरण में हुआ। यद्यपि उन्होंने कृषि कार्य नहीं किया परन्तु कृषि एवं पशुपालन परिवार की आजीविका का प्रमुख साधन था। अनिश्चितता ग्रामीण अर्थव्वस्था की एक विशेषता रही है। असाधारण से साधारण राजस्व अधिकारी किसानों को परेशान करते थे। वल्लभभाई पटेल ने किसानों एवं मजदूरों की कठिनाइयों पर अन्तर्वेदना प्रकट करते हुए कहा :‘‘दुनिया का आधार किसान और मजदूर पर हैं। फिर भी सबसे ज्यादा जुल्म कोई सहता है, तो यह दोनों ही सहते हैं। क्योंकि ये दोनों बेजुबान होकर अत्याचार सहन करते हैं। मैं किसान हूँ, किसानों के दिल में घुस सकता हूँ, इसलिए उन्हें समझता हूँ कि उनके दुख का कारण यही है कि वे हताश हो गये हैं। और यह मानने लगे हैं कि इतनी बड़ी हुकूमत के विरुद्ध क्या हो सकता है ? सरकार के नाम पर एक चपरासी आकर उन्हें धमका जाता है, गालियाँ दे जाता है और बेगार करा लेता है।’’  किसानों की दयनीय स्थिति से वे कितने दुखी थे इसका वर्णन करते हुए पटेल ने कहा: ‘‘किसान डरकर दुख उठाए और जालिम का लातें खाये, इससे मुझे शर्म आती है। और मैं सोचता हूँ कि किसानों को गरीब और कमजोर न रहने देकर सीधे खड़े करूँ और ऊँचा सिर करके चलने वाले बना दूँ। इतना करके मरूँगा तो अपना जीवन सफल समझूँगा।’’

2. बाल्यकाल एवं विद्यार्थी जीवन

वल्लभभाई का बाल्यकाल अपने माता-पिता के साथ अपने गाँव करमसद में ही व्यतीत हुआ। पिता बालक वल्लभाभाई को नित्य प्रातःकाल अपने साथ खेत पर ले जाते और आते-जाते रास्ते में पहाड़े याद कराते थे। यह उनकी प्रारम्भिक शिक्षा का प्रारम्भ था। इसके उपरान्त उन्होंने पटेलाद की पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण की। माध्यमिक शिक्षा के लिए वे पहले नड़ियाद, फिर बड़ौदा तथा इसके बाद पुनः नड़ियाद आये जहाँ से सन् 1897 में 22 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

वल्लभभाई विद्यार्थी जीवन से ही अत्यन्त निर्भीक थे। अन्याय के विरुद्ध विद्रोह उनके जीवन का विशिष्ट गुण था। जिसके परिणामस्वरूप विद्यार्थी जीवन में उन्हें कई बार अध्यापकों का विरोध सहना पड़ा। नड़ियाद में उनके विद्यायल के अध्यापक पुस्तकों का व्यापार करते थे तथा छात्रों को बाध्य करते थे कि पुस्तकें बाहर से न खरीदकर उन्हीं से खरीदें। वल्लभभाई ने इसका विरोध किया तथा छात्रों को अध्यापकों से पुस्तकें न खरीदने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप अध्यापकों और विद्यार्थियों में संघर्ष छिड़ गया। पाँच-छः दिन विद्यालय बन्द रहा। अन्त में अध्यापकों द्वारा पुस्तकें बेचने की प्रथा बन्द हुई।


मैट्रिक की पढ़ाई के लिए वल्लभभाई नड़ियाद से बदौड़ा गए। यहाँ भी अपनी निर्भीक प्रवृत्ति के कारण उनका एक अध्यापक से मनमुटाव हो गया। मैट्रिक में संस्कृत व गुजराती में से एक विषय लेना पड़ता था। वल्लभभाई ने गुजराती ली जिसे छोटेलाल नामक अध्यापक पढ़ाते थे। वे उन छात्रों को पसन्द नहीं करते थे जो संस्कृत में अरुचि के कारण गुजराती विषय चुनते थे। अध्यापक ने कटाक्ष करते हुए वल्लभभाई से कहा :‘‘संस्कृत छोड़कर गुजराती ले रहे हो, क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि संस्कृत के बिना गुजराती शोभा नहीं देती ?’’ वल्लभभाई ने तत्काल उत्तर दिया : ‘‘गुरूजी, यदि हम संस्कृत पढ़ते तो आप किसे पढ़ाते ?’’ वल्लभभाई की स्पष्टवादिता से अध्यापक चिढ़ गए।


उन्होंने न केवल वल्लभाभाई को दिनभर कक्षा की पिछली बेंच पर खड़े रहने की आज्ञा दी, साथ ही साथ प्रतिदिन घर से पहाड़े लिखकर लाने को कहा। एक दिन वल्लभभाई पहाड़े लिखकर नहीं ले गए। अध्यापक द्वारा कारण जानने पर उन्होंने उत्तर दिया : ‘‘पाड़े़ भाग गये।’’ पाड़े भैंस के बच्चें को भी कहते हैं। इस पर अध्यापक अधिक क्रोधित हो गए। 1949 में ‘शंकर वीकली’ के बच्चों के विशेषांक में एक सन्देश में पटेल ने अपने बाल्यकाल के विषय में कहा : ‘‘जहाँ तक मुझे ध्यान है, मैं शरारत में या छिपकर दूसरों को मूर्ख बनाने में पीछे नहीं रहता था। जहाँ मुझे स्मरण है, मैं यह कार्य अच्छे उद्देश्य हेतु करता था। मैं अध्ययन में उतना ही गंभीर था जितना कि खेलों में प्रसन्नचित्त। मुझे लापरवाह अध्यापकों से कोई सहानुभूति न थी। उनको मैं छोड़ता न था। बच्चों के रूप में अध्यापकों को ठीक करने का हम सबका अपना ढंग था और उसके लिए हम सब उन उपायों का प्रयोग करते थे जो बच्चों को करना चाहिए।’’ 
 

Monday, 13 December 2010

भगत सिंह

भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा.
भगत सिंह


पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है.

भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं.

दूसरी शिकायत मुझे खासकर हिन्दी के लेखकों से है. 17 वर्ष की उम्र में भगतसिंह को एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' विषय पर 'मतवाला' नाम के कलकत्ता से छपने वाली पत्रिका के लेख पर 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला था. भगतसिंह ने 1924 में लिखा था कि पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी नहीं देवनागरी होनी चाहिए.

यह आज तक हिन्दी के किसी भी लेखक-सम्मेलन ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है. आज तक हिन्दी के किसी भी बड़े लेखकीय सम्मेलन में भगतसिंह के इस बड़े इरादे को लेकर कोई धन्यवाद प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है. उनकी इस स्मृति में भाषायी समरसता का कोई पुरस्कार स्थापित नहीं किया गया. इसके बाद भी हम भगतसिंह का शहादत दिवस मनाते हैं. भगतसिंह की जय बोलते हैं. हम उनके रास्ते पर चलना नहीं चाहते. मैं तो लोहिया के शब्दों में कहूंगा कि रवीन्द्रनाथ टेगौर से भी मुझे शिकायत है कि आपको नोबेल पुरस्कार भले मिल गया हो. लेकिन 'गीतांजलि' तो आपने बांग्ला भाषा और लिपि में ही लिखी. एक कवि को अपनी मातृभाषा में रचना करने का अधिकार है लेकिन भारत के पाठकों को, भारत के नागरिकों को, मुझ जैसे नाचीज व्यक्ति को इतिहास के इस पड़ाव पर खड़े होकर यह भी कहने का अधिकार है कि आप हमारे सबसे बड़े बौद्धिक नेता हैं. लेकिन भारत की देवनागरी लिपि में लिखने में आपको क्या दिक्कत होती.

मैं लोहिया के शब्दों में महात्मा गांधी से भी शिकायत करूंगा कि 'हिन्द स्वराज' नाम की आपने अमर कृति 1909 में लिखी वह अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी. लेकिन उसे आप देवनागरी लिपि में भी लिख सकते थे. जो काम गांधी और टैगोर नहीं कर सके. जो काम हिन्दी के लेखक ठीक से करते नहीं हैं. उस पर साहसपूर्वक बात तक नहीं करते हैं. सन् 2009 में भी बात नहीं करते हैं. भगतसिंह जैसे 17 साल के तरुण ने हिन्दुस्तान के इतिहास को रोशनी दी है. उनके ज्ञान-पक्ष की तरफ हम पूरी तौर से अज्ञान बने हैं. फिर भी भगतसिंह की जय बोलने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है.

तीसरी बात यह है कि भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल विचारक नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं.

मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए.

भगतसिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था. वे किसी वणिक या तानाशाह के परिवार में पैदा नहीं हुए थे. मनुष्य के विकास में उसके परिवार, मां बाप की परवरिश, चाचा और औरों की भूमिका होती है. भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक विचारक थे, लेखक थे, देशभक्त नागरिक थे. उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त नागरिक थे. उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा. लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगतसिंह ने दीमक की तरह चाटीं. वे कहते हैं कि भगतसिंह किताबों को पढ़ता नहीं था. वह तो निगलता था.

1914 से 1919 के बीच पहला विश्वयुद्ध हुआ. उसका भी भगतंसिंह पर गहरा असर हुआ. भगतसिंह के पिता और चाचा कांग्रेसी थे. भगतसिंह जब राष्ट्रीय राजनीति में धूमकेतु बनकर, ध्रुवतारा बनकर, एक नियामक बनकर उभरने की भूमिका में आए, तब 1928 का वर्ष आया. 1928 हिन्दुस्तान की राजनीति के मोड़ का बहुत महत्वपूर्ण वर्ष है. 1928 में इतनी घटनाएं और अंग्रेजों के खिलाफ इतने आंदोलन हुए जो उसके पहले नहीं हुए थे. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि 1928 का वर्ष भारी उथलपुथल का, भारी राजनीतिक हलचल का वर्ष था. 1930 में कांग्रेस का रावी अधिवेशन हुआ. 1928 से 1930 के बीच ही कांग्रेस की हालत बदल गई. जो कांग्रेस केवल पिटीशन करती थी, अंग्रेज से यहां से जाने की बातें करती थी. उसको मजबूर होकर लगभग अर्धहिंसक आंदोलनों में भी अपने आपको कभी कभी झोंकना पड़ा. यह भगतसिंह का कांग्रेस की नैतिक ताकत पर मर्दाना प्रभाव था. हिन्दुस्तान की राजनीति में कांग्रेस में पहली बार युवा नेतृत्व अगर कहीं उभर कर आया है तो सुभाष बाबू और जवाहरलाल नेहरू के नाम. कांग्रेस में 1930 में जवाहरलाल नेहरू लोकप्रिय नेता बनकर 39 वर्ष की उम्र में राष्ट्र्रीय अध्यक्ष बने. उनके हाथों तिरंगा झंडा फहराया गया और उन्होंने कहा कि पूर्ण स्वतंत्रता ही हमारा लक्ष्य है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह चरित्र मुख्यत: भगतसिंह की वजह से बदला. भगतसिंह इसके समानांतर एक बड़ा आंदोलन चला रहे थे.

लोग गांधीजी को अहिंसा का पुतला कहते हैं और भगतसिंह को हिंसक कह देते हैं. भगतसिंह हिंसक नहीं थे. जो आदमी खुद किताबें पढ़ता था, उसको समझने के लिए अफवाहें गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसको समझने के लिए अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, ब्याज स्तुति और ब्याज निंदा की जरूरत नहीं है. भगतंसिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लेख लिखा है. भगतंसिंह ने नौजवान सभा का घोषणा पत्र लिखा जो कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर है. भगतसिंह ने अपनी जेल डायरी लिखी है, जो आधी अधूरी हमारे पास आई है. भगतसिंह ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का घोषणा पत्र, उसका संविधान बनाया.

पहली बार भगतसिंह ने कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है. भगतंसिंह के मित्र कॉमरेड सोहन सिंह जोश उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतंसिंह ने मना कर दिया. जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को चाटता था. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने उससे कहा 'ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है. थोड़ा रुको.' आप कल्पना करेंगे कि जिस आदमी को कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है. उसके बाद भी रोज किताबें पढ़ रहा है. भगतसिंह मृत्युंजय था. हिन्दुस्तान के इतिहास में इने गिने ही मृत्युंजय हुए हैं.

भगतसिंह ने कुछ मौलिक प्रयोग किए थे. इंकलाब जिंदाबाद मूलत: भगतसिंह का नारा नहीं था. वह कम्युनिस्टों का नारा था. लेकिन भगतसिंह ने इसके साथ एक नारा जोड़ा था 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद.' भगतसिंह ने तीसरा एक नारा जोड़ा था 'दुनिया के मजदूरों एक हो.' ये तीन नारे भगतसिंह ने हमको दिए थे. कम्युनिस्ट पार्टी या कम्युनिस्टों का अंतर्राष्ट्र्रीय क्रांति का नारा भगतसिंह की जबान में चढ़ने के बाद अमर हो गया. 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का नारा आज भी कुलबुला रहा है हमारे दिलों के अंदर, हमारे मन के अंदर, हमारे सोच में. क्या सोच कर भगतसिंह ने 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का नारा दिया होगा. तब तक गांधी जी ने यह नारा नहीं दिया था. क्या सोच कर भगतसिंह ने कहा दुनिया के मजदूरों एक हो.

हम उस देश में रहते हैं, जहां अंग्रेजों के बनाए काले कानून आज भी हमारी आत्मा पर शिकंजा कसे हुए हैं और हमको उनकी जानकारी तक नहीं है. हम इस बात में गौरव समझते हैं कि हमने पटवारी को पचास रुपए घूस खाते हुए पकड़वा दिया और हम समाज के बेहद ईमानदार आदमी हैं. हमें बड़ी खुशी होती है, जब लायंस क्लब के अध्यक्ष बनकर हम कोई प्याऊ या मूत्रशाला खोलते हैं और अपनी फोटो छपवाते हैं. हमें बेहद खुशी होती है अपने पड़ोसी को बताते हुए कि हमारा बेटा आईटीआई में फर्स्ट आया है और अमेरिका जाकर वहां की नौकरी कर रहा है और सेवानिवृत्त होने के बाद उसके बच्चों के कपड़े धोने हम भी जाएंगे. इन सब बातों से देश को बहुत गौरव का अनुभव होता है. लेकिन मूलत: भगतसिंह ने कहा क्या था.

भगतसिंह भारत का पहला नागरिक, विचारक और नेता है जिसने कहा था कि हिन्दुस्तान में केवल किसान और मजदूर के दम पर नहीं, जब तक नौजवान उसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई क्रांति नहीं हो सकती. कोई पार्टी नौजवानों को राजनीति में सीधे आने का आव्हान नहीं करती. यह अलबत्ता बात अच्छी हुई कि राजीव गांधी के कार्यकाल में 18 वर्ष के नौजवान को वोट डालने का अधिकार तो मिला. वरना नौजवान को तो हम बौद्धिक दृष्टि से हिन्दुस्तान की राजनीति में बांझ समझते हैं.

हम उस देश में रहते हैं, जहां की सुप्रीम कोर्ट कहती है कि जयललिता जी को इस बात का अधिकार है कि वे हजारों सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दें. और सरकारी कर्मचारियों का कोई मौलिक अधिकार नहीं है कि अपने सेवा शर्तों की लड़ाई के लिए धरना भी दे सकें. प्रदर्शन कर सकें. हड़ताल कर सकें. हम उस देश में रहते हैं, जहां नगरपालिकाएं पीने का पानी जनता को मुहैया कराएं, यह उनका मौलिक कर्तव्य नहीं है. अगर नगरपालिका पीने का पानी मुहैया नहीं कराती है तो भी हम टैक्स देने से नहीं बच सकते. इस देश का सुप्रीम कोर्ट और हमारा कानून कहता है कि आपको नगरपालिका पीने का पानी भले मत दे. आप प्यासे भले मर जाएं लेकिन टैक्स आपको देना पड़ेगा क्योंकि उनके और नागरिक के कर्तव्य में कोई पारस्परिक रिश्ता नहीं है. ये जो जंगल का कानून है 1894 का है.

हम नदियों का पानी उपयोग कर सकें इसका कानून उन्नीसवीं शताब्दी का है. भारतीय दंड विधान लॉर्ड मैकाले ने 1860 में बनाया था. पूरे देश का कार्य व्यापार सारी दुनिया से हो रहा है वह कांट्रेक्ट एक्ट 1872 में बना था. हमारे जितने बड़े कानून हैं, वे सब उन्नीसवीं सदी की औलाद हैं. बीसवीं सदी तो इस लिहाज से बांझ है. अंग्रेजों की दृष्टि से बनाए गए हर कानून में सरकार को पूरी ताकत दी गई है कि जनता के आंदोलन को कुचलने में सरकार चाहे जो कुछ करे, वह वैध माना जाएगा.

आजादी के साठ वर्ष बाद भी इन कानूनों को बदलने के लिए कोई भी सांसद हिम्मत नहीं करता. आवाज तक नहीं उठाता. भगतसिंह संविधान सभा में तो थे नहीं. भगतसिंह ने आजादी तो देखी नहीं. वे कहते थे कि हमको समाजवाद एक जीवित लक्ष्य के रूप में चाहिए जिसमें नौजवान की जरूरी हिस्सेदारी होगी. अस्सी बरस के बूढ़े नेता देश में चुनाव लड़ना चाहते हैं. 75 या 70 बरस के नेता को युवा कह दिया जाता है. 60 वर्ष के तो युवा होते ही होते हैं. हम 25 वर्षों के नौजवानों को संसद में नहीं भेजना चाहते.

महात्मा गांधी भी कहते थे इस देश में 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को किसी पार्टी को टिकट नहीं देना चाहिए. हम पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा आवारा पशुओं, वेश्याओं और साधुओं के देश हैं. सबसे ज्यादा बेकार, भिखारी, कुष्ठ रोगी, एड्स के रोगी, अपराधी तत्व, नक्सलवादी, भ्रष्ट नेता, चूहे, पिस्सू, वकील हमारे यहां हैं. शायद चीन को छोड़कर लेकिन अब हमारी आबादी भी उससे ज्यादा होने वाली हैं. क्या यही भगतसिंह का देश है. यही भगतसिंह ने चाहा था?

असेम्बली में भगतसिंह ने जानबूझकर कच्चा बम फेंका. अंग्रेज को मारने के लिए नहीं. ऐसी जगह बम फेंका कि कोई न मरे. केवल धुआं हो. हल्ला हो. आवाज हो. दुनिया का ध्यान आकर्षित हो. टी डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के खिलाफ भगतसिंह ने जनजागरण किया. कहां है श्रमिक आंदोलन आज? भारत में कैसी लोकशाही बची है? श्रमिक आंदोलनों को कुचल दिया गया है. इस देश में कोई श्रमिक आंदोलन होता ही नहीं है. होने की संभावना भी नहीं है. इस देश की खलनायकी में यहां की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों का बराबर का अधिकार है. यह भगतसिंह का सपना नहीं था. यह भगतसिंह का रास्ता नहीं है.

एक बिंदु की तरफ अक्सर ध्यान खींचा जाता है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कि महात्मा गांधी और भगतसिंह को एक दूसरे का दुश्मन बता दिया जाए. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था. लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर नहीं थे. उन्होंने जो बयान दिया है उस मुकदमे में जिसमें उनको फांसी की सजा मिली है, उतना बेहतर बयान आज तक किसी भी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया.

जेल के अंदर छोटी से छोटी चीज भी भगतसिंह के दायरे के बाहर नहीं थी. जेल के अंदर जब कैदियों को ठीक भोजन नहीं मिलता था और सुविधाएं जो मिलनी चाहिए थीं, नहीं मिलती थीं, तो भगतसिंह ने आमरण अनशन किया. उनको तो मिल गया. लेकिन क्या आज हिन्दुस्तान की जेलों में हालत ठीक है? भगतसिंह को संगीत और नाटक का भी शौक था. भगतसिंह के जीवन में ये सब चीजें गायब नहीं थीं. भगतसिंह कोई सूखे आदमी नहीं थे. भगतसिंह को समाज के प्रत्येक इलाके में दिलचस्पी थी. तरह तरह के विचारों से सामना करना उनको आता था. वे एक कुशल पत्रकार थे. आज हमारे अखबार कहां हैं? अमेरिकी पद्धति और सोच के अखबार. जिन्हें पढ़ने में दो मिनट लगता है. आप टीवी क़े चैनल खोलिए. एक तरह की खबर आएगी और सबमें एक ही समय ब्रेक हो जाता है. प्रताप, किरती, महारथी और मतवाला वगैरह तमाम पत्रिकाओं में हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी में भगतसिंह लिखते थे. उनसे ज्यादा तो किसी ने लिखा ही नहीं उस उम्र में. गणेशशंकर विद्यार्थी की उन पर बहुत मेहरबानी थी.

भगतसिंह कुश्ती बहुत अच्छी लड़ते थे. एक बार भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद में दोस्ती वाला झगड़ा हो गया तो भगतसिंह ने चंद्रशेखर आजाद को कुश्ती में चित्त भी कर दिया था. एक बहुरंगी, बहुआयामी जीवन इस नौजवान आदमी ने जिया था. वे मरे हुए या बूढ़े आदमी नहीं थे. खाने पीने का शौक भी भगतसिंह को था. कम से कम दुनिया के 35 ऐसे बड़े लेखक थे जिनको भगतसिंह ने ठीक से पढ़ रखा था. बेहद सचेत दिमाग के 23 साल के नौजवान के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से इसलिए भी झुकता है कि समाजवाद के रास्ते पर हिन्दुस्तान के जो और लोग उनके साथ सोच रहे थे, भगतसिंह ने उनके समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटककर उनसे विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को फायदा हो. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कुछ लोगों को मिलकर काम करना चाहिए था.

मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महात्मा गांधी और विवेकानंद मिलकर हिन्दुस्तान की राजनीतिक दिशा पर बात क्यों नहीं कर पाये. गांधीजी उनसे मिलने बेलूर मठ गए थे लेकिन विवेकानंद की बीमारी की वजह से सिस्टर निवेदिता ने उनसे मिलने नहीं दिया था. समझ में नहीं आता कि भगतसिंह जैसा विद्वान विचारक विवेकानंद के समाजवाद पर कुछ बोला क्यों नहीं, जबकि विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त को भगतसिंह ने भाषण देने बुलाया था. यह नहीं कहा जा सकता कि विवेकानंद के विचारों से भगतसिंह परिचित नहीं थे. उनके चेहरे से बहुत से कंटूर उभरते हैं, जिसको देखने की ताब हममें होनी चाहिए.

भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग अलग समझते थे. विवेकानंद समाजवाद और धर्म को सम्पृक्त करते थे. विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी. गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते थे. लेकिन भगतसिंह हिन्दुस्तान का पहला रेशनल थिंकर, पहला विचारशील व्यक्ति था जो धर्म के दायरे से बाहर था. श्रीमती दुर्गादेवी वोहरा को लेकर जब भगतसिंह को अंग्रेज जल्लादों से बचने के लिए अपने केश काटकर प्रथम श्रेणी के डब्बे में कलकत्ता तक की यात्रा करनी पड़ी तो लोगों ने आलोचना की. उन्होंने कहा कि सिख होकर अपने केश कटा लिए आपने? हमारे यहां तो पांच चीजें रखनी पड़ती हैं हर सिख को. उसमें केश भी होता है. यह आपने क्या किया. कैसे सिख हैं आप! जो सज्जन सवाल पूछ रहे थे वे शायद धार्मिक व्यक्ति थे. भगतसिंह ने एक धार्मिक व्यक्ति की तरह जवाब दिया कि मेरे भाई तुम ठीक कहते हो. मैं सिख हूं. गुरु गोविंद सिंह ने कहा है कि अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने शरीर का अंग अंग कटवा दो. मैंने केश कटवा दिए. अब मौका मिलेगा तो अपनी गरदन कटवा दूंगा. यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है. उस नए हिन्दुस्तान में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें हिन्दुस्तान के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए.

आज हम उसी में फंसे हुए हैं. क्या सबूत है कि अयोध्या में राम हुए थे? क्या सबूत है कि मंदिर बन जाने पर रामचंद्र जी वहां आकर विराजेंगे. क्या जरूरत है किसी मस्जिद को तोड़ दिया जाए. क्या जरूरत है कि देश के छोटे छोटे मंदिरों को तोड़ दिया जाए. क्या जरूरत है कि होली दीवाली के त्यौहार पर और कोई बम फेंक दे. इन सारे सवालों का जवाब हम 2009 में ढूंढ़ नहीं पा रहे हैं.

भगतसिंह ने शहादत दे दी, फकत इतना कहना भगतसिंह के कद को छोटा करना है. जितनी उम्र में भगतसिंह कुर्बान हो गए, इससे कम उम्र में मदनलाल धींगरा और शायद करतार सिंह सराभा चले गए थे. भगतसिंह ने तो स्वयं मृत्यु का वरण किया. यदि वे पंजाब की असेंबली में बम नहीं फेंकते तो क्या होता. कांग्रेस के इतिहास को भगतसिंह का ऋणी होना पड़ेगा. लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल और बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस की अगुआई की थी. भगतसिंह लाला लाजपत राय के समर्थक और अनुयायी शुरू में थे. उनका परिवार आर्य समाजी था. भूगोल और इतिहास से काटकर भगतसिंह के कद को एक बियाबान में नहीं देखा जा सकता. जब लाला लाजपत राय की जलियान वाला बाग की घटना के दौरान लाठियों से कुचले जाने की वजह से मृत्यु हो गई तो भगतसिंह ने केवल उस बात का बदला लेने के लिए एक सांकेतिक हिंसा की और सांडर्स की हत्या हुई. भगतसिंह चाहते तो और जी सकते थे. यहां वहां आजादी की अलख जगा सकते थे. बहुत से क्रांतिकारी भगतसिंह के साथी जिए ही. लेकिन भगतसिंह ने सोचा कि यही वक्त है जब इतिहास की सलवटों पर शहादत की इस्तरी चलाई जा सकती है. जिसमें वक्त के तेवर पढ़ने का माधा हो, ताकत हो वही इतिहास पुरुष होता है.

भगतसिंह ने सारी दुनिया का ध्यान अंग्रेज हुक्मरानों के अन्याय की ओर खींचा और जानबूझकर असेंबली बम कांड रचा. भगतसिंह इतिहास की समझ के एक बहुत बड़े नियंता थे. हम उस भगतसिंह की बात ज्यादा क्यों नहीं करते? भगतसिंह का एक बहुत प्यारा चित्र है जिसमें वे चारपाई पर बैठे हुए हैं. उस चेहरे में हिन्दुस्तान नजर आता है. ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान बैठा हुआ है.

भगतसिंह पर जितनी शोधपरक किताबें लिखी जानी चाहिए थी, उतनी अच्छी किताबें अब भी नहीं लिखी गई हैं. कुछ लोग भगतसिंह के जन्मदिन और शहादत के पर्व को हाल तक मनाते थे. अब उनके हाथ में साम्प्रदायिकता के दूसरे झंडे आ गए हैं. उनको भगतसिंह काम का नजर नहीं आता. किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र को पढ़िए. उनके भी जो समाजवाद का डंका पीट रहे हैं. तो लगेगा कि सब ढकोसला है. हममें से कोई काबिल नहीं है जो भगतसिंह का वंशज कहलाने का अधिकारी हो. भगतसिंह की याद करने का अधिकारी हो. हम उस रास्ते को भूल चुके हैं.

अमेरिका के साम्राज्यवाद के सामने हम गुलामी कर रहे हैं. हम पश्चिम के सामने बिक रहे हैं. बिछ रहे हैं. इसके बाद भी हम कहते हैं हिन्दुस्तान को बड़ा देश बनाएंगे. गांधी और भगतसिंह में एक गहरी राजनीतिक समझ थी. भगतसिंह ने गांधी के समर्थन में भी लिखा है. उनके रास्ते निस्संदेह अलग अलग थे. उनकी समझ अलग अलग थी. जब गांधीजी केन्द्र में थे. कांग्रेस के अंदर एक बार भूचाल आया. गांधीजी के भगतसिंह सम्बन्धी विचार को नकारने की स्थिति आई. उस समय 1500 में लगभग आधे वोट भगतसिंह के समर्थन में आए. भगतसिंह को समर्थन देना या नहीं देना इस पर कांग्रेस विभाजित हो गई. इसी वजह से युवा जवाहरलाल नेहरू को 1930 में रावी कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. कांग्रेस के जिस दूसरे नौजवान नेता ने भगतसिंह का वकील बनकर मुकदमा लड़ने की पेशकश की और गांधी का विरोध किया, वह सुभाष बोस 1938 में हरिपुरा और फिर 1939 में त्रिपुरी की कांग्रेस में गांधी के उम्मीदवार को हराकर कांग्रेस का अध्यक्ष बना. इन सबमें भगतसिंह का पुण्य, याद और कशिश है. नौजवानों को आगे करने की जो जुगत भगतसिंह ने बनाई थी, जो राह बताई थी, उस रास्ते पर भारत का इतिहास नहीं चला. मैं नहीं समझता कि नौजवान केवल ताली बजाने के लायक हैं. मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तान के नौजवानों को राजनीति से अलग रखना चाहिए. मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तान के 18 वर्ष के नौजवान जो वोट देने का अधिकार रखते हैं उनको राजनीति की समझ नहीं है. जब अस्सी नब्बे वर्ष के लोग सत्ता की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ सकते तो नौजवान को हिन्दुस्तान की राजनीति से अलग करना मुनासिब नहीं है. लेकिन राजनीति का मतलब कुर्सी नहीं है.

भगतसिंह ने कहा था जब तक हिन्दुस्तान के नौजवान हिन्दुस्तान के किसान के पास नहीं जाएंगे, गांव नहीं जाएंगे. उनके साथ पसीना बहाकर काम नहीं करेंगे तब तक हिन्दुस्तान की आजादी का कोई मुकम्मिल अर्थ नहीं होगा. मैं हताश तो नहीं हूं लेकिन निराश लोगों में से हूं.

मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान को पूरी आजादी नहीं मिली है. जब तक ये अंगरेजों के बनाए काले कानून हमारे सर पर हैं, संविधान की आड़ में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से लेकर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री फतवे जारी करते हैं कि संविधान की रक्षा होनी है. किस संविधान की रक्षा होनी चाहिए? संविधान में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, केनेडा, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, जापान और कई और देशों की अनुगूंजें शामिल हैं. इसमें याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी, चार्वाक, कौटिल्य और मनु के अनुकूल विचारों के अंश नहीं हैं. गांधी नहीं हैं. भगतसिंह नहीं हैं. लोहिया नहीं हैं. इसमें केवल भारत नहीं है.

हम एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश का शिकार हैं. हमको यही बताया जाता है कि डॉ अंबेडकर ने हिन्दुस्तान के संविधान की रचना की. भारत के स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों ने हिन्दुस्तान के संविधान की रचना की. संविधान की पोथी को बनाने वाली असेम्बली का इतिहास पढ़ें. सेवानिवृत्त आईसीएस अधिकारी, दीवान साहब और राय बहादुर और कई पश्चिमाभिमुख बुद्धिजीवियों ने मूल पाठ बनाया. देशभक्तों ने उस पर बहस की. उस पर दस्तखत करके उसको पेश कर दिया. संविधान की पोथी का अपमान नहीं होना चाहिए लेकिन जब हम रामायण, गीता, कुरान शरीफ, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहब पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए. तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, आयतों को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है.

भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि किसी की बात को तर्क के बिना मानो. जब मैं भगतसिंह से तर्क करता हूं. बहस करता हूं. तब मैं पाता हूं कि भगतसिंह के तर्क में भावुकता है और भगतसिंह की भावना में तर्क है. भगतसिंह हिन्दुस्तान का पहला नेता था, पूरी क्रांतिकारी सेना में भगतसिंह अकेला था, जिसने दिल्ली के सम्मेलन में कहा कि हमें सामूहिक नेतृत्व के जरिए पार्टी को चलाने का शऊर सीखना चाहिए. वह तमीज सीखनी चाहिए ताकि हममें से कोई अगर चला जाए तो पार्टी मत बिखरे. भगतसिंह ने सबसे पहले देश में कहा था कि व्यक्ति से पार्टी बड़ी होती है. पार्टी से सिद्धांत बड़ा होता है. हम यह सब भूल गए. हमको केवल तमंचे वाला भगतसिंह याद है. अगर कोई थानेदार अत्याचार करता है तो हमको लगता है भगतसिंह की तरह हम उसे गोली मार दें. हम उसको अजय देवगन समझते हैं या धर्मेन्द्र का बेटा.

भगतसिंह किताबों में कैद है. उसको किताबों से बाहर लाएं. भगतसिंह विचारों के तहखाने में कैद है. उसको बहस के केन्द्र में लाएं. इसका रास्ता भी भगतसिंह ने ही बताया था. भगतसिंह ने कहा था कि ये बड़े बड़े अखबार तो बिके हुए हैं. इनके चक्कर में क्यों पड़ते हो. भगतसिंह और उनके साथी छोटे छोटे ट्रैक्ट 16 और 24 पृष्ठों की पत्रिकाएं छाप कर आपस में बांटते थे. हम यही कर लें तो इतनी ही भगतसिंह की सेवा बहुत है. विचारों की सान पर अगर कोई चीज चढ़ेगी वही तलवार बनेगी. यह भगतसिंह ने हमको सिखाया था. कुछ बुनियादी बातें ऐसी हैं जिनकी तरफ हमको ध्यान देना होगा.

हमारे देश में से तार्किकता, बहस, लोकतांत्रिक आजादी, जनप्रतिरोध, सरकारों के खिलाफ अराजक होकर खड़े हो जाने का अधिकार छिन रहा है. हमारे देश में मूर्ख राजा हैं. वे सत्ता पर लगातार बैठ रहे हैं. जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर नहीं करना आता वो देश के राजनीतिक चेक पर दस्तखत कर रहे हैं. हमारे यहां एक आई एम सॉरी सर्विस आ गई है. आईएएस क़ी नौकरशाही. उसमें अब भ्रष्ट अधिकारी इतने ज्यादा हैं कि अच्छे अधिकारी ढूंढ़ना मुश्किल है. हमारे देश में निकम्मे साधुओं की जमात है. वे निकम्मे हैं लेकिन मलाई खाते हैं. इस देश के मेहनतकश मजदूर के लिए अगर कुछ रुपयों के बढ़ने की बात होती है, सब उनसे लड़ने बैठ जाते हैं. हमारे देश में असंगठित मजदूरों का बहुत बड़ा दायरा है. हम उनको संगठित करने की कोशिश नहीं करते. हमारे देश में पहले से ही सुरक्षित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के कानून बने हुए हैं. लेकिन भारत की संसद ने आज तक नहीं सोचा कि भारत के किसानों के भी अधिकार होने चाहिए. भारतीय किसान अधिनियम जैसा कोई अधिनियम नहीं है. किसान की फसल का कितना पैसा उसको मिले वह कुछ भी तय नहीं है. एक किसान अगर सौ रुपये के बराबर का उत्पाद करता है तो बाजार में उपभोक्ता को वह वस्तु हजार रुपये में मिलती है. आठ सौ नौ सौ रुपये बिचवाली, बिकवाली और दलाली में खाए जाते हैं. उस पर भी सरकार का संरक्षण होता है और सरकार खुद दलाली भी करती है. ऐसे किसानों की रक्षा के लिए भगतसिंह खड़े हुए थे.

भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के उद्योगपतियो एक हो जाओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि अपनी बीवी के जनमदिन पर हवाई जहाज तोहफे में भेंट करो और उसको देश का गौरव बताओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि वकीलो एक हो जाओ क्योंकि वकील होने के नाते मुझे पता है कि वकीलों को एक रखना और मेंढकों को तराजू पर रखकर तौलना बराबर की बात है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के डॉक्टरों को एक करो. उनको मालूम था कि अधिकतर डॉक्टर केवल मरीज के जिस्म और उसके प्राणों से खेलते हैं. उनका सारा ध्येय इस बात का होता है कि उनको फीस ज्यादा से ज्यादा कैसे मिले. अपवाद जरूर हैं. लेकिन अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं. इसलिए भगतसिंह ने कहा था दुनिया के मजदूरो एक हो. इसलिए भगतसिंह ने कहा था कि किसान मजदूर और नौजवान की एकता होनी चाहिए. भगतसिंह पर राष्ट्रवाद का नशा छाया हुआ था. लेकिन उनका रास्ता मार्क्स के रास्ते से निकल कर आता था. एक अजीब तरह का राजनीतिक प्रयोग भारत की राजनीति में होने वाला था. लेकिन भगतसिंह काल कवलित हो गए. असमय चले गए.

भगतसिंह संभावनाओं के जननायक थे. वे हमारे अधिकारिक, औपचारिक नेता बन नहीं पाए. इसलिए सब लोग भगतसिंह से डरते हैं-अंगरेज और भारतीय हुक्मरान दोनों. उनके विचारों को क्रियान्वित करने में सरकारी कानूनों की घिग्गी बंध जाती है. संविधान पोषित राज्य व्यवस्थाओं में यदि कानून ही अजन्मे रहेंगे तो लोकतंत्र की प्रतिबद्धताओं का क्या होगा? भगतसिंह ने इतने अनछुए सवालों का र्स्पश किया है कि उन पर अब भी शोध होना बाकी है. भगतसिंह के विचार केवल प्रशंसा के योग्य नहीं हैं, उन पर क्रियान्वयन कैसे हो-इसके लिए बौद्धिक और जन आन्दोलनों की जरूरत है.
 

राम प्रसाद बिस्मिल

राम प्रसाद बिस्मिल