Showing posts with label राष्ट्रभाषा हिन्दी. Show all posts
Showing posts with label राष्ट्रभाषा हिन्दी. Show all posts

Wednesday, 16 February 2011

हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए,

हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए,

जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ था तब हमने सोचा था कि हमारे आजाद देश में हमारी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति होगी लेकिन यह क्या? अँग्रेजों से तो हम स्वतंत्र हो गए पर अँग्रेजी ने हमको जकड़ लिया।
हम यह बात कर रहे हैं कि हिन्दी भाषी राज्यों को अँग्रेजी की जगह हिन्दी का प्रयोग करना चाहिए। महात्मा गाँधी के समय से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति दक्षिण भार‍त नाम की संस्था अपना काम कर रही थी। दूसरी तरफ सरकार स्वयं हिन्दी को प्रोत्साहन दे रही थी यानी अब हिन्दी के प्रति कोई विरोधाभाव नहीं था और जहाँ तक हमारा प्रश्न है हम बिलकुल नहीं चाहते कि देश के किसी भी हिस्से पर हिन्दी को आरोपित किया जाए।
अँग्रेजी विश्व की बहुत बड़ी जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रमुख भाषा है। दरअसल हम कहते हैं कि 'अँग्रेजी हटाओ ', यह नहीं कहते हैं कि ' अँग्रेजी मिटाओ' । हमारी बात लोग गलत समझते है। हमारा यह तात्पर्य नहीं कि अँग्रेजी को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए क्योंकि यह सच है कि यह हमें साम्राज्यवादियों से विरासत में मिली है। वैसे भी आज हिन्दी को यह सम्मान नहीं मिल पा रहा है।
अँग्रेजी के इस बढ़ते प्रचलन के कारण एक साधारण हिन्दी भाषी नागरिक आज यह सोचने पर मजबूर है कि क्या हमारी पवित्र पुस्तकें जो हिन्दी में हैं , वह भी अँग्रेजी में हो जाएँगी। हमारा राष्‍ट्रगीत , राष्ट्रगान, हमारी पूजा-प्रार्थना सब अँग्रेजी में हो जाएँगे। हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए, लेकिन आजकल की पीढ़ी जब भी अपना मुँह खोलती है तो सिर्फ और सिर्फ अँग्रेजी ही बोलती है। क्या इस प्रकार के रवैये से हमारी यह उम्मीद कि 'हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाना ' कभी संभव हो पाएगा।
हिन्दी , भाषाई विविधता का एक ऐसा स्वरूप जिसने वर्तमान में अपनी व्यापकता में कितनी ही बोलियों और भाषाओं को सँजोया है। जिस तरह हमारी सभ्यता ने हजारों सावन और हजारों पतझड़ देखें हैं , ठीक उसी तरह हिन्दी भी उस शिशु के समान है , जिसने अपनी माता के गर्भ में ही हर तरह के मौसम देखने शुरू कर दिए थे। हिन्दी की यह माता थी संस्कृत भाषा , जिसके अति क्लिष्ट स्परूप और अरबी , फारसी जैसी विदेशी और पाली, पाकृत जैसी देशी भाषाओं के मिश्रण ने हिन्दी को अस्तित्व प्रदान किया। जिस शिशु को इतनी सारी भाषाएँ अपने प्रेम से सींचे उसके गठन की मजबूती का अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है।
सातवीं शताब्दी (ई.पू.) से दसवीं शताब्दी (ई.पू) के बीच संस्कृत भाषा के अपभ्रंश के रूप में उत्पन्न हिन्दी अभी अपनी माँ के गर्भ में ही थी , जिस दौरान पाली और पाकृत जैसी भाषाओं का प्रभाव उनके चरम पर था। यह वही समय था जब बौद्ध धर्म पूर्णतः परिपक्व हो चुका था और पाली व पाकृत जैसी आसान भाषाओं में इसका व्यापक प्रसार हो रहा था।
देखा जाए तो पुरातन हिन्दी का अपभ्रंश के रूप में जन्म 400 ई. से 550 ई. में हुआ जब वल्लभी के शासक धारसेन ने अपने अभिलेख में 'अपभ्रंश साहित्य ' का वर्णन किया। हमारे पास प्राप्त प्रमाणों में 933 ई. की ' श्रावकचर' नामक पुस्तक ही अपभ्रंश हिन्दी का पहला उदाहरण है। परंतु हिन्दी का वास्तविक जन्मदाता तो अमीर खुसरो ही था , जिसने 1283 में खड़ी हिन्दी को जन्म देते हुए इस शिशु का नामकरण '‍ हिन्दवी' किया।
खुसरो दरिया प्रेम का , उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया , जो डूबा सो पार
( अमीर खुसरो की एक रचना - 'हिन्दवी ' में...)
यह हिन्दी का जन्म मात्र एक भाषा का जन्म न होकर भारत के मध्यकालीन इतिहास का प्रारंभ भी है , जिसमें भारतीय संस्कृति के साथ अरबी व फारसी संस्कृतियों का अद्‍भुत संगम नजर आता है। तुर्कों और मुगलों के प्रभाव में पल्लवित होती हिन्दी को उनकी नफासत विरासत में मिली। वहीं दूसरी ओर इस समय भक्ति और आंदोलन भी काफी क्रियाशील हो चुके थे , जिन्होंने कबीर ( 1398- 1518 ई.), रामानंद (1450 ई.) , बनारसी दास (1601 ई.), तुलसीदास (1532-1623 ई.) जैसे प्रकांड विद्वानों को जन्म दिया।
इन्होंने हिन्दी को अपभ्रंश , खड़ी और आधुनिक हिन्दी के अलंकारों से सुसज्जित करके हिन्दी का श्रृंगार किया। इस काल की एक और विशेषता यह भी थी कि इस काल में हिन्दी को अपनी छोटी बहन 'उर्दू ' मिली, जो अरबी, फारसी व हिन्दी के मिश्रण अस्तित्व में आई। इस कड़ी में मुगल बादशाह शाहजहाँ ( 1645 ई.) के योगदानों ने उर्दू को उसका वास्तविक आकार प्रदान किया।
अँग्रेजी शासन तक यह अल्हड़ किशोरी शांत व गंभीर युवती के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी। अँग्रेजियत के समावेश ने हिन्दी को त्तकालीन परिवेश में एक नया परिधान दिया। अब आधुनिक हिन्दी में तरह-तरह के प्रयोग अपने शीर्ष पर थे।
किताबों , उपन्यासों, ग्रंथों, काव्यों के साथ-साथ हिन्दी राजनीतिक चेतना का माध्यम बन रही थी। 1826 ई. में 'उद्दंत मार्तण्ड' नामक पहला हिन्दी का समाचार तत्कालीन बुद्धिजीवियों का प्रेरणा स्रोत बन चुका था। अब हिन्दी में आधुनिकता का पूर्णतः समावेश हो चुका था।
अँग्रेजों के शासन ने जहाँ हिन्दी को आधुनिकता का जामा पहनाया , वहीं हिन्दी उनके विरोध और स्वतंत्र भारत के स्वप्न का भी प्रभावी माध्यम रही। तमाम हिन्दी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने देश के बुद्धिजीवियों में स्वतंत्रता की लहर दौड़ाई। स्वतंत्र भारत के कर्णधारों ने जो स्वतंत्रता का स्वप्न देखा उसमें स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा के रूप हमेशा हिन्दी को ही देखा।
शायद यही वजह है कि स्वतंत्रता के उपरांत हिन्दी को 1949-1950 में केंद्र की आधिकारिक भाषा का सम्मान मिला। वर्तमान में हिन्दी विश्व की सबसे अधिक प्रयोग में आने वाली भाषाओं में दूसरा स्थान रखती है। हो सकता है कि अँग्रेजी का प्रभाव प्रौढ़ा हिन्दी पर अधिक नजर आता हो , मगर इस हिन्दी ने अपने भीतर इतनी भाषाओं और बोलियों को समेटकर अपनी गंभीरता का ही परिचय दिया है। हो सकता है कि भविष्य में हिन्दी भी किसी अन्य 'अपभ्रंश ' शिशु को जन्म दे, पर राष्ट्रभाषा का गौरव हर भारतीय में नैसर्गिक रूप से व्याप्त होगा।
हिन्दी उस बाजार में ठिठकी हुई-सी खड़ी है , जहाँ कहने को सब अपने हैं, लेकिन फिर भी बेगाने से... इस बेगानेपन की टहनियों से भी उम्मीद की कोपलें फूट रही हैं। क्योंकि हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हो रहा है, लेकिन उसकी पठनीयता , उसका साहित्य सिसकियाँ भर रहा है। क्या हिन्दी समाज ने खुद ही हिन्दी को रद्द कर दिया है ? इसमें दोष भाषा का नहीं, बल्कि बाजार का है। वैसे भी बाजार का सीधा-सा नियम है बेचना। इस बेचने से कोई भाषा कैसे बच सकती है ?
आज हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए सामूहिक होकर उसके साहित्य और उससे जुड़ी बोलियों को पूरी कर्मठता से आगे ठेलने की जरूरत है। तब ही होगा हिन्दी दिवस साकार , हिन्दी का उद्धार।

आमतौर पर हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहा जाता है कि यहाँ साहित्य पर वह माहौल नहीं है जितना अन्य भाषाई क्षेत्रों में है। इस बात में काफी सचाई भी है क्योंकि गत पाँच दशक के मनन , अवलोकन के बाद ऐसी टिप्पणियाँ अब ज्यादा मुखर हो रही हैं। 1757 की प्लासी की लड़ाई के बाद ब्रिटिश व्यापारवाद ने बंगला भाषा पर आक्रमण किया था। लेकिन बंगाल में चले सुधारवादी आंदोलनों से , आध्यत्मिक उभार ने , नवचेतना ने (राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, चैतन्य महाप्रभु, चंडीदास , बंकिमचंद्र, विवेकानंद, काजी नजरुल इस्लाम , रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरद बाबू) बांग्ला भाषा, साहित्य, चेतना को और ज्यादा ऊँचाई दी।
बांग्ला पूरी शिद्दत से भारत की प्रवक्ता भाषा भी सिद्ध हुई। इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल (इससे लगे असम तथा उड़िया भाषा में भी) में भाषा तथा साहित्य में विवेकपूर्ण आचरण भी विकसित हुआ जो आज के आपाधापी पूर्ण समय में भी बदस्तूर जारी है। बांग्ला में कोई भी साहित्यकार हो , हर रचनाधर्मी , लेखक कलाकार के अवदान को स्वीकारा जाता है- विचारधारा के संघर्ष , पक्षधरता के बावजूद विरोधी लेखक के रचना पाठ में उसकी छपी रचना पर हो रही चर्चा में उसको एक सिरे से खारिज नहीं किया जाता। उसके भाषाई , साहित्यिक जनप्रतिबद्धता , भाषा-बोली को स्वीकारा जाता है।
हिन्दी का क्षेत्र व्यापक है। हिन्दी सिर्फ इसीलिए ही व्यापक नहीं है कि वह ज्यादा लोगों के द्वारा बोली जाती है बल्कि हिन्दी का साहित्य ज्यादा व्यापक है। उसकी जड़ें गहरी हैं। इसके मूल में हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो अपने में एक बड़ी परंपरा , इतिहास , सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है।
वह किसी खेमे से प्रमाण-पत्र का मुँह नहीं देखती। बल्कि स्थिति यह है कि 'मठों' को अपनी बोलियों के जनसंघर्ष के स्पंदन उनके ई.सी.जी. नहीं पकड़ पाते हैं। आज हिन्दी में काफी लिखा जा रहा, बेहतर लिखा जा रहा है, कहानी में व्यापक फलक हैं , बारीकियाँ हैं। कविता में जबर्दस्त चेतना , भाषा का प्रवाह, चट्टानों को आकार में बदलने की उद्दाम छटपटाहट है।

निबंधों में नया विकास सामने आया है। उपन्यासों में नवीन इलाके , बंजर हो रही जमीन को उर्वरा बनाने का रचनात्मक जोश साफ झलक रहा है। इस पूरे रचनाक्रम में पूरी भारतीय मनीषा की उपस्थिति है। बांग्लादेश , भारत , पाकिस्तान सहित चीनी, ईरानी, अफ्रीकी रचनाओं में भी बराबरी से आ रहा है। चीनी साहित्यकार 'मो यान ' की रचनाएँ कहीं भी पराई नहीं लगतीं। उसकी जमीन , वही है जो नेरुदा की है, पोट्टेकाट, भीष्म साहनी की है।
हिन्दी में स्थानीयता अंततः विश्व विरासत का रचनाकर्म ही है जो उसे अभिव्यक्त करती है। हिन्दी संसार में परेशानी है कि अपने-अपने खेमों , अपने तंबुओं को सही साहित्य बताने की 'जिद' ने हिन्दी को परेशानी में डाल दिया है। जरूरत बांग्ला भाषा, असमी भाषा वाली विवेकशीलता की है। बेशक हम-आप अपने-अपने घरों की सुविधाओं में रहें , लेकिन साहित्यिक ईद या दशहरे पर एक-दूसरे से गले तो मिलें।
अंततः हम एक महत्वपूर्ण भाषा में लिखते हैं और साहित्य जैसे जवाबदार कर्म से जुड़े हैं अतः हिन्दी का हित , उसका विकास प्रथम प्राथमिकता में होना चाहिए। वाद और विचार , समाज से आते हैं इसलिए समाज की प्राथमिकता जरूरी है- वह बचेगा , वह समृद्ध होगा तो वाद-विचार भी पुख्ता होकर उभरेगा। हिन्दी की स्थिति ऐसी है जैसे विदेशी आक्रमणों के वक्त भी राजाओं , नवाबों ने आपसी लड़ाइयाँ नहीं छोड़ी थीं। शेष इतिहास हम जानते हैं। इस वक्त भी हिन्दी को बाजारवाद लील रहा है।
अब वह सिर्फ हिन्दी मानक भाषा के बरखिलाफ ही नहीं वरन हिन्दी की ताकत उसकी बोलियों की तरफ है। नरभक्षी की दाढ़ में खून लगा है। वह स्वाद चख चुका है। बाजारवाद , बोलियों के मासूम आँगन में जा घुसा है। यदि बोलियाँ ध्वस्त हो गईं तो हिन्दी का शक्तिकेंद्र ही ढीला पड़ जाएगा। एक बोली या भाषा का मरना सिर्फ अक्षरों की मौत नहीं होती पूरी , अभिव्यक्ति , पूरा देश, पूरी रवायत, पूरी संस्कृति अपाहिज हो जाती है। अफ्रीका के कई देश साम्राज्यवाद , आर्थिक साम्राज्यवाद की भेंट चढ़ चुके हैं। बेहतर होगा , हिन्दी क्षेत्र खेमावाद छोड़े, समीक्षा बाहर निकले, वरना अपनों की हत्या करने वाला विजेता नहीं बनता। इस समय बोलियों, उसकी परंपरा तथा भारतीय भाषाओं, हिन्दी में भातृभाव की सर्वाधिक जरूरत है।

हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए, लेकिन आजकल की पीढ़ी जब भी अपना मुँह खोलती है तो सिर्फ और सिर्फ अँग्रेजी ही बोलती , राष्ट्रभाषा :: ::हिन्दी की ऐसी दुर्दशा के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बदले यह कहीं अधिक उपयोगी होगा कि हम सभी हिन्दीप्रेमी एकजुट होकर नई पीढ़ी की भाषायी योग्यता को बढ़ाने का प्रयत्न करें।

हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए, लेकिन आजकल की पीढ़ी जब भी अपना मुँह खोलती है तो सिर्फ और सिर्फ अँग्रेजी ही बोलती
राष्ट्रभाषा:: ::हिन्दी की ऐसी दुर्दशा के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बदले यह कहीं अधिक उपयोगी होगा कि हम सभी हिन्दीप्रेमी एकजुट होकर नई पीढ़ी की भाषायी योग्यता को बढ़ाने का प्रयत्न करें
सब अंगरेजी के पक्षधरों के गुप्त षड़यन्त्र का परिणाम है। जिस भाषा को अस्थायी रूप से सहराष्ट्रभाषा की मान्यता दी गई थी, उसके प्रभावशाली अनुयायी एक ओर तो जय हिन्दी का नारा लगाते रहे और दूसरी ओर हिन्दी की जड़ें काटने में लगे रहे। उन्होंने धीरे-धीरे पहले उच्च शिक्षा ओर फिर बाद में माध्यमिक शिक्षा, हिन्दी के बदले अंगरेजी में दिए जाने में भरपूर शक्ति लगा दी। यदि हिन्दी भाषा किसी प्रकार उनके चंगुल से बच भी गई, तो तमाम अंगरेजी तकनीकी शब्द उसमें ठूंस दिए गए यह बहाना बनाकर कि हिन्दी के शब्द संस्कृतनिष्ट और जटिल हैं; भौतिकी कठिन है- फिजिक्स सरल है, विकल्प आंखों के आगे अंधेरा ला देता है- आल्टरनेटिव तो भारत का जन्मजात शिशु भी समझता है। धीरे-धीरे चलनेवाली इस मीठी छुरी से कटी भारत की भोली जनता पर इन पन्द्रह-बीस वर्षों में एक ऐसा मुखुर अल्पमत छा गया है, जो सड़क को रोड, बाएं-दाएं को लैफ्ट-राइट, परिवार को फैमली, चाचा-मामा को अंकल, रंग को कलर, कमीज को शर्ट, तश्तरी को प्लेट, डाकघर को पोस्ट आफिस और संगीत को म्यूजिक आदि शब्दों से ही पहचानता है। उनके सामने हिन्दी के साधारण से साधारण शब्द बोलिए, तो वे टिप्पणी करते हैं कि आप बहुत शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी बोलते हैं। 
 
हिन्दी भाषा में अंगरेजी के शब्दों का समावेश करने के बारे में भाषाशास्त्रियों में चर्चाएं चलती रहती हैं। हिन्दी ही क्या, विभिन्न भाषाएं एक-दूसरी भाषा के शब्दों के आदान-प्रदान से मुख्यत: समृद्ध ही होती हैं। नए शब्द बहुधा एक नई ताजगी अपने साथ लाते हैं, जिससे भाषा का संदर्श व्यापक होता है। उदाहरण के लिए मानसून शब्द पूर्वी एशिया से भारत आया और ऐसा रम गया जैसे वह यहां का ही मूलवासी हो। दक्षिण भारत से ‘जिंजर’ सारी दुनिया में चला गया और विडम्बना यह है कि अनेक लोग उसे पश्चिम की देन मानते हैं। इसी प्रकार उत्तर भारत के योग शब्द से स्वास्थ्य लाभ करने वाले सारे संसार में फैले हुए हैं।
अभी पिछले कुछ वर्षों में इन्डोनेशिया आदि से ‘सुनामी’ की लहर ऐसी उठी जिसकी शक्ति सारे संसार ने अनुभव की। ‘रेडियो’ कहीं भी पैदा हुआ, वह सार्वभौमिक बन गया। अंगरेजी का ‘बिगुल’ पूरे दक्षिण एशिया में बजता है।

केवल शक्तिशाली शब्द ही दूसरी भाषाओं में नहीं जाते हैं। अनेक साधारण-से दीखने वाले शब्द भी महाद्वीपों को पार कर जाते हैं। जब लोग विदेश से लौटते हैं, तो वे अपने साथ वहां दैनिक व्यवहार में उपयोग होने वाले कुछ शब्दों को भी अपने सामान के साथ बांध लाते हैं। अंगरेज जब इंगलैण्ड वापस गए, तो भारत के ‘धोबी’ और ‘आया’ को भी साथ ले गए। इसी प्रकार पूर्वी और पश्चिमी अफ्रीका से लौटे भारतीयों का साथ ‘किस्सू’ (चाकू), ‘मचुंगा’ (संतरा) और ‘फगिया’ (झाड़ू) भी चली आई।
किसी अन्य भाषा के शब्दों या शब्द-समूहों का उपयोग हजारों वर्षों से होता आया है। यदि एक पंडितजी अपने हिन्दी प्रवचन में संस्कृत के किसी श्लोक आदि का उद्धरण दें या कोई मौलवी कुरान की अरबी भाषा की आयत के माध्यम से अपने विचार को सिद्ध करे, तो सुनने या पढ़ने वाले लोग उसका लोहा मानते हैं। लैटिन की कुछ पंक्तियां बीच में डाल देने से आलेख की गरिमा बढ़ जाती है। यदि कोई व्यक्ति शेक्सपियर, शैली या कीट्स आदि की कुछ पंक्तियां वक्तव्य में छिड़क दे, तो वह अपने अध्ययन की व्यापकता प्रदर्शित करता है। फ्रेंच मुहावरे ‘डे जावू’ आदि का प्रयोग मनुष्य के उच्च सामाजिक क्षेत्र की झलक दिखाता है।
दूसरी भाषा के शब्द देशी हों या विदेशी, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हां, अन्तर पड़ता है उनकी मात्रा से। जहां एक ओर दाल में नमक की तरह दूसरी भाषा के शब्द उसे स्वादिष्ट बनाते हैं, वहां उनकी बहुतायत उसे गले से नीचे नहीं उतरने देती। एक बार एक संयासी भारत से इंगलैण्ड आए। अपने कुछ सलाहकारों के आग्रह पर उन्होंने अपना प्रवचन अंगरेजी में देना आरम्भ किया। श्रोताओं के हाव-भाव से शीघ्र ही उन्हें स्पष्ट हो गया कि सभी उनकी बात समझ रहे थे। तो फिर क्या कमी थी! उन्होंने प्रयोग के रूप में अपनी भाषा प्रवचन के बीच ही बदली ।हिन्दी में बोलने लगे। उसके साथ ही अंगरेजी के कुछ चुने हुए शब्द भी वे प्रयोग करते रहे। हृदय और मस्तिष्क के सम्मेलन ने उनके प्रवचन को सरस और प्रभावकारी बना दिया था।

जब हिन्दी के कुछ हितैषी अपनी भाषा में अंगरेजी की बढ़ती घिसपैठ का विरोध करते हैं, तो अंगरेजीवादी अल्पसंख्यक खीज उठते हैं। वे अपने विरोधियों पर आरोप लगाते हैं कि वे लोग हिन्दी को सभी अच्छी धाराओं से काटकर उसे तालाब या पोखर बनाना चाहते हैं। वह उनका दृष्टिकोण है, जो उनका मूलभूत अधिकार है। परन्तु यदि उपमा की बात हो, तो एक उपमा यह भी दी जा सकती है कि कोई भी स्वाभिमानी जलप्रबंधक एक स्वच्छ नदी में किसी भी छोटी-मोटी जलधारा को प्रवेश देने की अनुमति प्रदान करने से पूर्व अपने आप को संतुष्ट कर लेना चाहेगा कि वह जलधारा कूड़े-कचरे से मुक्त हो। यदि इसके निरीक्षण-परीक्षण पर वह जलधारा खरी उतरे, तो वह उसे आने देगा अन्यथा नहीं क्योंकि वह जानता है कि अपरीक्षित जल न केवल स्वयं गंददी से भरा हो सकता है बल्कि पूरी नदी को भी अपनी सड़ांद से भर डालने की क्षमता रखता है।

अंगरेजी के कुछ समर्थक हिन्दी पर अनम्यता और दूसरी भाषाओं के साथ मिलकर काम न करने का आरोप लगाते हैं। उन्हें संतुष्ट करने के लिए अरबी और फारसी के साथ बनाए गए शब्दों की लम्बी सूची बनाना या उनके बारे में अधिक लिखना पाठकों के सहजज्ञान का अपमान करने जैसा होगा। फिर भी प्रसंगवश एक शब्द तो यहां दिया ही जा सकता है: चौराहा शब्द को देखकर कितने लोग सोचते हैं कि वह दो भाषाओं के मिलन से बनाया गया है। इसी तरह अंगरेजी से मिलकर रेलगाड़ी, बमबारी, डाक्टरी और रेडियोधर्मी किरण जैसे अनेक शब्द हमने बनाए हैं। उनका प्रयोग करने में किसी भी हिन्दी भाषी को आपत्ति नहीं।

भारत की स्वंतरता पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया। तब पुरुषोत्तमदास टंडन, डाo राजेन्द्रप्रसाद आदि के प्रभाव से विद्यालयों में हिन्दी को शिक्षा का मुख्य माध्यम आरम्भ हुआ। सौभाग्यवश मैं उस पीढ़ी का व्यक्ति हूं जिसने गणित, भूगोल, भौतिकी और रसायनशास्त्र आदि विषय हिन्दी में पढ़े। जी हां, लघुत्तम, महत्तम, वर्ग, वर्गमूल, चक्रवर्ती ब्याज और अनुपात जैसे शब्दों से मैंने अंकगणित सीखा। उच्च गणित में समीकरण, ज्या, कोज्या, बल, शक्ति और बलों के त्रिभुजों का बोलबाला रहा। भूगोल पढ़ते समय उष्णकटिबंध, जलवायु, भूमध्यरेखा, ध्रुव और पठार जैसे शब्द बहुत सहजभाव से मेरे शब्द-भंडार का अंग बन गए। विज्ञान में द्रव्यमान, भार, गुरुत्वाकर्षण, व्यतक्रमानुपात, चुम्बकीय क्षेत्र, मिश्रण, यौगक और रसायनिक क्रिया आदि शब्दों ने मुझे कभी भी भयभीत नहीं किया। और न ही किसी व्यवसाय को चिकित्सक या लेखाकार घोषित करते हुए मेरे मन में किसी प्रकार का हीनभाव आया। मैं आज तक स्वयं को सिविल अधिवक्ता (अंगरजी के साथ मिलाकर बनाया गया एक अन्य शब्द) कहने में गर्व अनुभव करता हूं।

जिनकी गोद में बैठकर आज की पीढ़ी ने कविता लिखनी सीखी उन्होंने बच्चों के लिए भूगोल (राधेश्याम शर्मा प्रगल्भ) और ऐतिहासिक घटनाओं (सुमित्राकुमारी चौहान व सोहनलाल द्विवेदी) आदि विषयों पर सरल और सुन्दर कविताएं लिखीं। जयशंकरप्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथलीशरण गुप्त, देवराज दिनेश, रामधारी सिंह दिनकर और गोपालदास नीरज आदि को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अंगरेजी की शरण में जाने की आवश्यकता कभी अनुभव नहीं हुई। महादेवी वर्मा बिना अंगरेजी की सहायता के न केवल तारक मंडलों की यात्राएं करती रहीं, बल्कि जो भी उनके सम्पर्क में आया उसे पढ़ती भी रहीं। हरिवंशराय बच्चन ने अंगरेजी की सरिता में गोते तो खूब लगाए और अपने पाठकों के लिए उस सरिता के अनेक रत्न भी निकालकर सौंपे, परन्तु उस भाषा को अपने मूल लेखन में फटकने तक नहीं दिया। आचार्य चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावनलाल वर्मा और प्रेमचन्द अपनी भाषा से करोड़ों पाठकों के पास पहुंचे। जहां एक ओर यशपाल, डाo धर्मवीर भारती, और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय आदि का अंगरेजी से कोई झगड़ा नहीं हुआ, वहां दूसरी ओर उन्होंने अपने साहित्य में इस भाषा के शब्दों की आवश्यकता कभी नहीं समझी। डाo सत्यप्रकाश (गणित), डाo कार्तिकप्रसाद (तकनीकी विषय), श्यामसुन्दर शर्मा (विज्ञान-प्रगति) और जयप्रकाश भारती (विज्ञान) आदि अपने चुने हुए क्षेत्रों में जटिल विषयों पर धड़ल्ले से लिखते रहे। मैंने स्वयं भूगर्भशास्त्र पर हिन्दी की पहली पुस्तक ‘धरती की दैलत’ में धातुमेल (अलाँय) और ‘संसार के अनोखे पुल’ नामक पुस्तक में छज्जापुल (कैन्टीलीवर ब्रिज) और मेहराब (आर्च) जैसे शब्द प्रयोग किए, जिन्हें पाठक समझ गए।

निश्चय ही ऐसे भी अनेक सफल लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंगरेजी के शब्दों का सफलतापूर्वक उपयोग अपने साहित्य में किया है। काका हाथरसी की कविता में अंगरेजी के शब्द देखे जा सकते हैं। उल्लेखनीय यह है कि काका ने उन शब्दों का प्रयोग मुख्यतः तुकबन्दी के लिए किया और काफी हास्य सृजन भी उससे हुआ। क्या कोई यह कह सकता है कि यदि वे अंगरेजी के इन शब्दों का प्रयोग न करते, तो उनकी कविता में हास्य कम पड़ जाता? कुछ भी हो, उनकी कविता के पकवान में अंगरेजी शब्दों की चीनी पाठकों को प्रिय लगी। परन्तु अब कुछ लोग मात्र चीनी से ही हमें संतुष्ट करना चाहते हैं – मावा भूल जाइए, बस चीनी भर ही फंकिए। आखिर इस परिवर्तन का कारण क्या है?

बिना किसी मीठी लपेट लगाए मैं कहना चाहूंगा कि यह सब अंगरेजी के पक्षधरों के गुप्त षड़यन्त्र का परिणाम है। जिस भाषा को अस्थायी रूप से सहराष्ट्रभाषा की मान्यता दी गई थी, उसके प्रभावशाली अनुयायी एक ओर तो जय हिन्दी का नारा लगाते रहे और दूसरी ओर हिन्दी की जड़ें काटने में लगे रहे। उन्होंने धीरे-धीरे पहले उच्च शिक्षा ओर फिर बाद में माध्यमिक शिक्षा, हिन्दी के बदले अंगरेजी में दिए जाने में भरपूर शक्ति लगा दी। यदि हिन्दी भाषा किसी प्रकार उनके चंगुल से बच भी गई, तो तमाम अंगरेजी तकनीकी शब्द उसमें ठूंस दिए गए यह बहाना बनाकर कि हिन्दी के शब्द संस्कृतनिष्ट और जटिल हैं; भौतिकी कठिन है- फिजिक्स सरल है, विकल्प आंखों के आगे अंधेरा ला देता है- आल्टरनेटिव तो भारत का जन्मजात शिशु भी समझता है। धीरे-धीरे चलनेवाली इस मीठी छुरी से कटी भारत की भोली जनता पर इन पन्द्रह-बीस वर्षों में एक ऐसा मुखुर अल्पमत छा गया है, जो सड़क को रोड, बाएं-दाएं को लैफ्ट-राइट, परिवार को फैमली, चाचा-मामा को अंकल, रंग को कलर, कमीज को शर्ट, तश्तरी को प्लेट, डाकघर को पोस्ट आफिस और संगीत को म्यूजिक आदि शब्दों से ही पहचानता है। उनके सामने हिन्दी के साधारण से साधारण शब्द बोलिए, तो वे टिप्पणी करते हैं कि आप बहुत शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी बोलते हैं। यदि आप किसी पुरुष को सर या महिला को मैडम शब्द द्वारा संबोधित न करें, तो वे आपको ऐसे देखते हैं जैसे उनके सामने कोई अनपढ़ गंवार आ खड़ा हुआ हो।

वर्तमान भाषा नीति पर आधारित उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद इस अल्पमत के सदस्यों के लिए अंगरेजी शब्दों के फूलों की लड़ियां प्रयोग किए बिना चार वाक्य भी एक साथ हिन्दी में लिखना या बोलना कठिन दिखाई देता है। वे कहते हैं:

इक्सक्यूस मी, अभी आप पेशन्ट को नहीं देख सकते।
या
मैं कनाट प्लेस में ही शौपिंग करता हूं।
या
मेरा हसबैण्ड बिजनेसमैन है।
या
इन्डिया में बहौत प्रोग्रस हुई है।
यह भाषायी दिवालापन नहीं, तो और क्या है। एक संस्मरण: पिछले वर्ष ऐसे ही एक व्यक्ति ने दूरभाष पर मुझसे कहा: “मैंने सोचा कि आपको बर्थडे विश कर दूं ।” मैंने इन्हें उत्तर दिया कि आप मुझे विष देने के बदले अपनी शुभकामनाएं दें। अपने वाक्य के विद्रूप को सुनकर वे खूब हंसे और उन्होंने सौगंद खाई कि भविष्य में कभी भी किसी भी व्यक्ति को विष नहीं देंगे। क्या हिन्दी के सभी हितैषियों को ऐसा ही नहीं करना चाहिए?

हिन्दी की ऐसी दुर्दशा के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बदले यह कहीं अधिक उपयोगी होगा कि हम सभी हिन्दीप्रेमी एकजुट होकर नई पीढ़ी की भाषायी योग्यता को बढ़ाने का प्रयत्न करें। कुछ लाख लोगों को विदेश से विदेशीमुद्रा के थैले भरकर लाने या कालसैंटर – दूरभाष केन्द्र में बैठकर विदेशी ग्राहकों से अंगरेजी में बात करने की क्षमतावाले लोगों की सेना तैयार करने की धुन में हम भारत के करोड़ों युवक-यवतियों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को अनदेखा कर रहे हैं। उनकी क्षमताओं का पूर्णतः विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें राष्ट्रभाषा या मातृभाषा में शिक्षा दी जाए – प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च और तकनीकी शिक्षा तक। पहले उन्हें हिन्दी में सभी विषय पढ़ाइए, हिन्दी के शब्दों के साथ। तब देखिए कि उन्हें अंरेजी की कितनी आवश्यकता या मजबूरी - विवशता रह जाती है। हिन्दी केवल सड़कों पर ठुमका लगाते हुए चलचित्र बनाने वालों की भाषा नहीं है। न ही हिन्दी केवल उनके लिए है जो अपने कुछ मित्रों के साथ बैठकर वाह-वाह करने मात्र से संतुष्ट हो जाते हों, बल्कि उन सभी के लिए भी होनी चाहिए जिनमें अपना जीवन – विज्ञान, न्याय, शिक्षा, व्यवस्था, शोध और विकास की समस्त कार्यप्रणाली हिन्दी में कर सकने की क्षमता हो।

यदि हमने ऐसा नहीं किया, तो कुछ ही वर्षों में स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि आज की हिन्दी समझने वाले लोग बचेंगे ही नहीं। अंगरेजी ही सब कुछ हो जाएगी – सहराष्ट्रभाषा के बदले वह राष्टट्रभाषा घोषित कर दी जाएगी। तब शायद हिन्दी लेखकों या कवियों की बात किसी की भी समझ में नहीं आएगी और हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों की आवश्यकता भी न रह जाएगी। आशा है कि हम सब मिलकर इस भंयकर संभावना को रोक सकेंगे। 
हम गर्व से कहते हैं कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। इसे हम भारतवासी को अपनाना चाहिए, लेकिन आजकल की पीढ़ी जब भी अपना मुँह खोलती है तो सिर्फ और सिर्फ अँग्रेजी ही बोलती...........................