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Thursday, 3 March 2011

सत्ता जब रावण जैसे विद्वान ब्राम्हण के हाथ में पहुंची तो उसने भी सर्व सत्ता को चुनौती दे डाली। इस युग को भी एक राम की आवश्यकता है

” सत्ता तो भ्रष्ट होती ही है, शासक का कोई चरित्र नहीं होता”, 

सत्ता जब रावण जैसे विद्वान ब्राम्हण के हाथ में पहुंची तो उसने भी सर्व सत्ता को चुनौती दे डाली। इस युग को भी एक राम की आवश्यकता है

 जो लोकतंत्र के कथित ‘महाजनों’ के भ्रष्टाचार से पर्दा उठा सके। कहते हैं अवसर ईमान का शत्रु है और नित नये अवसरों ने भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों का ईमान कमजोर कर दिया है।


यथा राजा तथा प्रजा के देश में आजकल भ्रष्टाचार के एक-एक कर कई मामले सामने आ रहें हैं। लोकतंत्र के ‘महाजन’ अपने-अपने ढंग से घोटालों की व्याख्या कर रहे हैं। विपक्ष जेपीसी की मांग पर अडा है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पीएसी के समक्ष प्रस्तुत होने को तैयार। ऐसे विकट समय में प्रसिद्ध उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की एक उक्ति दृष्टव्य है” सत्ता तो भ्रष्ट होती ही है, शासक का कोई चरित्र नहीं होता”, सत्ता जब रावण जैसे विद्वान ब्राम्हण के हाथ में पहुंची तो उसने भी सर्व सत्ता को चुनौती दे डाली। इस युग को भी एक राम की आवश्यकता है जो लोकतंत्र के कथित ‘महाजनों’ के भ्रष्टाचार से पर्दा उठा सके। कहते हैं अवसर ईमान का शत्रु है और नित नये अवसरों ने भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों का ईमान कमजोर कर दिया है। इस देश ने बोफोर्स जैसा घोटाला देखा, चुनाव हुये और विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गये। आज विश्वनाथ प्रताप सिंह इस संसार में नही हैं किन्तु बोफोर्स घोटाले पर झूठा सच की चादर डाल दिया गया है। संप्रग सरकार में जब तहलका टेप सामने आया तो तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज पर उंगलियां उठी। उन्होने पद छोड़ा और फिर पद पर वापस आ गये।
गठबंधन सरकार की मजबूरियों को संप्रग प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने भी निकटता से भोगा और आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही समूची कांग्रेस ए. राजा के दंश को झेल रही है। जब भ्रष्टाचार स्वभाव में शामिल हो जाय तो उससे निपटना आसान नहीं होता। यह समय ऐसा है कि छोटे से घोटाले की बात करो तो बडे घोटाले का द्वार दिखायी पड़ने लगता है। बिहार में पशु चारा घोटाला सुर्खियां बना और फिलहाल लालू प्रसाद राजनीतिज्ञ अज्ञातवास भोगने की ओर हैं। उत्तर प्रदेश में गरीब लोगों के निवाले छीनकर खाद्यान्न घोटाला हुआ, समाजवादी पार्टी की सरकार के समय हुये खाद्यान्न घोटाले पर न जाने क्यों वर्तमान बहुजन समाज पार्टी की सरकार भी मौन है। ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ के इस शर्मनाक समय में उम्मीद की किरण कहां से लायें। किसे गालियां दें और किसे गले लगा लें। जब आदर्श घोटला कर देश के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, बड़े नौकरशाहों को कारगिल विधवाओ के हक पर डाका डालने में संकोच नही है तो ऐसे समय को क्या नाम दें।
यदि कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जद में है तो संप्रग सरकार भी इससे मुक्त कहां रही। लोकतंत्र में लोक- लाज को वर्तमान राजनीतिज्ञों ने जैसे नमस्कार सा कर लिया हो। जब तक नेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों की तिकड़ी पर अंकुश नहीं लगाया जायेगा, भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहेंगे, चंद दिनों का शोर होगा और फिर सब कुछ टांय-टांय फिस्स। बेहतर हो कि भ्रष्टाचार के सवाल पर जनता भी मोर्चा संभाले।